प्रकृति ने महिला और पुरुष को एक-दूसरे के
सहयोगी और पूरक के रूप में पेश किया है लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से देखा
जाए तो इन दो अनमोल कृतियों को हम हमेशा प्रतिस्पर्धा और भेदभाव जैसे मसलों
में ही उलझा हुआ देखते हैं. निश्चित रूप से इसके पीछे महिलाओं को पुरुषों
की तुलना में कमतर और दूसरे दर्जे का मानने जैसी प्रवृत्ति विद्यमान रही
है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में महिला उत्थान और उन्हें समान अधिकार
दिलवाने जैसी मुहिम में तेजी आई है लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाओं के हालातों
में आज भी हम बहुत अधिक परिमार्जन नहीं देख सकते क्योंकि आज के आधुनिक युग
में भी महिलाओं को अपनी प्रॉपर्टी समझने वाले पुरुषों की कोई कमी नहीं है.
समाज अभी भी पुरुष प्रधान है
महिलाएं खुद तय करें अपने कर्तव्य
व्यवहारिक रूप में अगर देखा जाए तो जिस प्रकार व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग होता है उसी प्रकार उसकी प्राथमिकताएं और जरूरतें भी अलग होती हैं. ताइवान क्या भारत जैसे परंपरागत देश में भी बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन से ज्यादा परिवार और बच्चों को महत्व नहीं देतीं. वहीं कुछ का जीवन केवल अपने परिवार तक ही सीमित रहता है. निश्चित तौर पर यह व्यक्तिगत निर्णय है, जिसका पालन करने के लिए कोई डिक्शनरी या फरमान बाध्य नहीं कर सकते.
देश हो या
विदेश प्राय: सभी समाज अपने मौलिक रूप में पुरुष प्रधान रहे हैं जिसका
खामियाजा हमेशा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. यूं तो प्रारंभिक समय से ही
महिलाओं को पुरुषों के अधीनस्थ रखने का प्रचलन रहा है लेकिन हाल ही की एक
घटना इस परंपरा को और अधिक पुख्ता करते हुए यह प्रमाणित कर रही है कि भले
ही समय बदल गया हो लेकिन मानव स्वभाव और नजरिया कभी परिवर्तित नहीं हो
सकता.
ताइवान में महिला कर्तव्य संहिता की ऑनलाइन डिक्शनरी
ताइवान के
शिक्षा मंत्रालय ने एक ऑनलाइन डिक्शनरी जारी की है जिसके अंतर्गत महिलाओं
के कार्यों और उनकी जिम्मेदारियों का बखान किया गया है. डिक्शनरी के अनुसार
आधुनिक महिलाओं की पहचान उनका अपने पति और परिवार के प्रति समर्पण और
प्रेम है. इसके अनुसार महिलाओं को चाहिए कि वे अपने पति और परिवार के लोगों
का सम्मान करें. इतना ही नहीं वह अपना ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों की
देखभाल में व्यतीत करें और अपने विवाह को कामयाब बनाने की हर संभव कोशिश
करें. वहीं दूसरी ओर पुरुष का दायित्व केवल अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार
रहने और परिवार का ध्यान रखने तक सीमित रखा गया है.
इस
डिक्शनरी के जारी होने की ही देर थी कि महिलाओं के हितों की पैरवी करने
वाले लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. कई महिला संगठनों ने इस फरमान को महिलाओं
के विरुद्ध बताते हुए यह आरोप लगाया है कि यह महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन
कर उन्हें परिवार और पति की सेवा के दायरे में बांधने का जरिया है. जबकि
पति को परिवार से संबंधित कोई दायित्व नहीं दिए गए हैं.
महिलाओं के खिलाफ है यह कारनामा
उल्लेखनीय
है कि ताइवान की 20-49 वर्ष की अधिकांश महिलाएं अविवाहित होने के साथ-साथ
कई अकादमिक उपाधियां भी प्राप्त कर चुकी हैं. वह विवाह से ज्यादा अपने
कॅरियर पर ध्यान देती हैं. ऐसे में आधुनिकता के नाम पर उनके जीवन को सीमित
करना उनके प्रति अन्याय ही है.
हालांकि
इस फरमान के विरुद्ध महिलाओं का अपनी आवाज उठाना पूरी तरह जायज है लेकिन
अगर हम दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो क्या महिलाओं का अपने परिवार और पति की
देखभाल करना गलत है?
हां, यह
बात जरूर है कि महिलाओं को भी अपने हितों की ओर ध्यान देने का पूरा अधिकार
है लेकिन क्या अपने हितों को साधते हुए उनका अपने परिवार के प्रति उदासीन
रवैया रखना उचित है? वैसे भी अधिकांश परिवारों में महिलाएं ही अपने बच्चों
और पति की देखभाल करती हैं क्योंकि स्वाभाविक तौर पर ही पुरुषों को अपने
परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
व्यवहारिक रूप में अगर देखा जाए तो जिस प्रकार व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग होता है उसी प्रकार उसकी प्राथमिकताएं और जरूरतें भी अलग होती हैं. ताइवान क्या भारत जैसे परंपरागत देश में भी बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन से ज्यादा परिवार और बच्चों को महत्व नहीं देतीं. वहीं कुछ का जीवन केवल अपने परिवार तक ही सीमित रहता है. निश्चित तौर पर यह व्यक्तिगत निर्णय है, जिसका पालन करने के लिए कोई डिक्शनरी या फरमान बाध्य नहीं कर सकते.
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