ऐसे ही कहीं , एक काली रात में कोई रेप थोड़े ही हो जाता
तुम मर गयीं, चलो अच्छा हुआ ! वरना लोगों ने
तुम्हे ज़िंदा लाश तो पहले ही कहना शुरू कर दिया था। तुम्हारे माँ – बाप को
‘बेचारे माँ – बाप’ का तमगा पहले ही नसीब हो चुका था। नेताओं को गाली
देना, सरकार को दोषी ठहराना तो बस एक तरीका था अपने अपराध बोध को छुपाने
का। राज की बात बताऊँ , तुम्हारी मौत का ज़िम्मेदार मैं ही हूँ। हाँ, मैं !
ऐसे ही कहीं , एक काली रात में कोई रेप थोड़े ही हो जाता है ! ये मेरी
कायरता का नतीज़ा है कि तुम्हारा रेप हुआ और फिर ऐसा हमला कि दुनिया का
कोई डाक्टर तुम्हारा इलाज़ नहीं कर पाया।
अगर मुझ में ज़रा भी मर्दानगी होती तो
मैंने तुम्हे बचपन में पिटते या गाली खाते हुए थोड़े ही देखा होता। अगर मुझ
में ज़रा भी इंसानियत होती तो में उठ खडा होता उस हर हाथ के खिलाफ जिसने
तुम्हे चोट पहुंचाने की कोशिश की थी। में लड़ता उस हर गाली के खिलाफ जो
दोस्त-यार प्यार में एक दूसरे को देते हैं जिनमे एक दूसरे की माँ – बहन
चोद कर मर्दानगी को सहलाया और दुलारा जाता है। अगर मुझ में मर्दानगी होती
तो में चुप ना रहता जब भी मनोरंजन के नाम पर तुम्हे सरे बाज़ार खडा कर के
तुम्हारी चोली, तुम्हारे सीने , तुम्हारे जलते बदन और तुम्हारी जवानी के
चर्चे कर के तुम्हे बदनाम किया जाता था।
मेरे DNA के अन्दर ये नामर्दी कूट कूट कर
भरी है और मैं इस वजह से बेहद शर्मिन्दा हूँ, यही कारण है कि मैं औरतो
को दबा- धमका कर अपने मर्द होने का खोखला दावा पेश करता हूँ .
लेकिन मौक़ा मिलते ही कभी , मन ही मन तो कभी सच- मुच उनका बलात्कार कर
देता हूँ ताकि वो अपनी हदें ना भूलें।
क्या करूँ , मजबूर हूँ। मेरे अन्दर का
जानवर, मेरे बस मैं नहीं रहता। माँ दुर्गा के चित्र जो आधा भैंसा और आधा
आदमी दिखाई पड़ता है न, दरअसल मैं वही हूँ। मैं उस अन्दर के भैंसे को छिपा
कर रखता हूँ इस दुनिया से
लेकिन कभी कभी वो मेरे अन्दर से बाहर निकल आता है।
कभी कभी तो वो तीन साल की बच्ची देख कर भी हुंकारे भरने लगता है और जब तक अपनी भूख
मिटा न ले, शांत नहीं होता। 3 साल या 30 साल,
मुझे तो बस एक ही चीज़ नज़र आती है।
इसीलिए तो मैं मंदिरों के बाहर लम्बी लम्बी लाइन लगा कर अपने गुनाहों की क्षमा माँगता हूँ , बार - बार आध्यात्म की चादर ओढ़ कर अपने अन्दर के भैंसे को छुपाने की कोशिश करता हूँ।
मेरे सुधरने के तो कोई आसार नहीं है लेकिन
तुम्हे क्या हो गया है। साडी के कई लपेटों में लिपटे -लिपटे, करवा-चौथ का
खोखला व्रत रखते रखते, चूड़ी, बिछिया ,
सिन्दूर और बिंदी जैसे गुलामी प्रतीकों के नीचे दबे दबे,
हम जैसे जानवरों के लिए खाना बनाते-
बनाते और उनकी हाँ मैं हाँ मिलाते , तुम भी भूल गयी कि तुम क्या हो?!
जब जब इंसान के अन्दर के जानवर ने तुम पर ग़लत निगाह डाली है , वो सिर्फ तुम्हारी शक्ति से ही पराजित हुआ है।
याद करो,
उस आदमी के रूप में छिपे जानवर को मारने के लिए कोई भी आगे नहीं आ पाया था।
सब पराजित हो चुके थे उस से लेकिन फिर तुमने अकेले ही उस भैंसे का गला काट डाला।
मेरा गला भी काट दो। मुझ को मुक्ति दे दो इस पाशविकता से, इस वहशीपने से।
अब ये मेरे बर्दाश्त के बाहर है। बस , तुमसे ही उम्मीद है।
तुम ही इस दुनिया को , इस समाज को फिर से भयमुक्त कर सकती हो। हम हारे हुए
खड़े हैं। अपने अपराध को छिपाने के लिए इधर- उधर कौने ढूंढ रहे हैं ,
अपने नपुंसक क्रोध को इधर उधर उछाल रहे है लेकिन किसी से कुछ नहीं हो रहा।
क्यों, क्योंकि हम उन्ही मैं से एक हैं
जिन्होंने उस रात एक अकेली लड़की का रेप किया था।
ऐसे ही कहीं , एक काली रात में कोई रेप थोड़े ही हो जाता है !
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