Monday, 18 February 2013

लॉ स्टूडेंट्स ने दो महीने तक हैवानियत का खेल खेला


             लॉ स्टूडेंट्स ने दो महीने तक हैवानियत का खेल खेला 



“दामिनी” की मौत हो गई। कई दिन से जिस बात के होने का डर था –वो बात आखिरकार हो ही गई। दामिनी चली गई। सच कहूं तो मुझे उसके बचने की आशा थी भी नहीं। सफ़दरजंग अस्पताल में दाखिल किए जाने के बाद डॉक्टरों ने उसकी दशा का जो बयान किया था –उसे देखते हुए लग रहा था कि दामिनी को केवल कोई चमत्कार ही बचा सकता था। लेकिन जिस तरह से उस 23-वर्षीया लड़की ने दर्द और मौत का सामना किया उसे देखकर तो सिर सजदे में झुक जाता है।दामिनी को अपनी दरिन्दगी का शिकार बनाने वाले छह पशुओं में एक 17 साल का लड़का भी शामिल है। चूंकि उसकी उम्र अठारह वर्ष से कम है इसलिए उसका केस जुवेनाइल कोर्ट में सुना जाएगा। कानून ही ऐसा है कि उसे अधिक-से-अधिक तीन साल की जेल होगी जिसमें उसे सुधारने के प्रयत्न किए जाएंगे। पुलिस के मुताबिक इस लड़के ने दामिनी को सबसे अधिक बर्बरता से मारा था –और उसका बलात्कार भी किया था। इस लड़के ने दामिनी के साथ क्या-क्या किया इसका भयावह विवरण मीडिया की कुछ शुरुआती रिपोर्ट्स में आया था। उस विवरण को पढ़कर मानवता से विश्वास उठता हुआ-सा लगा था।








इतनी पशुता का प्रदर्शन करने के बावज़ूद यह लड़का केवल तीन वर्ष बाद हमारे बीच खुला घूम रहा होगा –और हम इसे पहचान भी नहीं पांएगे क्योंकि कानूनन उसकी तस्वीर और नाम को हमेशा छुपाकर रखा जाएगा। यह जानते हुए कि इस लड़के को तीन वर्ष के दौरान “सुधारने” की कोशिश की जाएगी –क्या आप अपनी बेटी, बहन, बीवी या दोस्त को इसके करीब सुरक्षित महसूस करेंगे?बाल कानून के मुताबिक अठारह वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को “बच्चा” माना जाता है और उसके द्वारा किए गए अपराधों को “निर्दोष कदम” माना जाता है। कोई बच्चा यदि चोरी करता पकड़ा जाए –तो यह समझ में भी आता है कि उसका अपराध शायद निर्दोष हो सकता है। चोरी, मार-पीट, गाली-गलौच और… कुछ वाकयों में… चलिए हत्या के बारे में भी हम मान सकते हैं कि बच्चे ऐसे अपराध बालपन की निर्दोषता के चलते कर बैठते हैं। उन्हें अच्छे-बुरे की समझ नहीं होती… लेकिन दामिनी का बलात्कार? और वो भी ऐसी घोर दरिन्दगी के साथ?… क्या बलात्कार जैसे केस में भी उस 17 साल के लड़के पर “बालपन” का ठप्पा लगाकर उसे आसानी से छोड़ दिया जाना चाहिए?
एक प्रश्न यह भी है कि क्या आज सत्रह वर्ष का व्यक्ति वाकई “बच्चा” रह जाता है? मेरा मानना है कि अब से तीस वर्ष पहले जो मानसिक उम्र बच्चे अठारह साल की आयु में पाते थे –उससे कहीं अधिक मानसिक उम्र अब वे 13-14 साल की आयु में ही पा लेते हैं। जो जानकारियाँ पहले दुर्लभ हुआ करती थीं –वे अब सबके मोबाइल फ़ोन पर उपलब्ध हैं। आज का टी.वी. और सिनेमा बच्चों को समय से पहले “बड़ा” करने में खूब योगदान दे रहा है। पाँच-छह साल के बच्चों से टी.वी. पर “चोली के पीछे” जैसे गीतों पर डांस करवाया जा रहा है –टी.वी. वालों की कमाई हो रही है और जनता मूर्खों की तरह इन बच्चों के “सेक्सी मूव्स” पर तालियाँ पीटती दिखाई देती है। इंटरनेट की बढ़ती पहुँच ने बच्चों को हर जानकारी उपलब्ध करा दी है। अश्लील फ़िल्में खुले-आम दस-रुपए-प्रति-सीडी के हिसाब से बाज़ार में मिल रही हैं।



अब से पचास साल पहले अधिकांश बच्चों में जो “भोलापन” होता था अब उसके अस्तित्व की गुंजाइश ही नहीं रह गई है… नैतिकता किस चिड़िया का नाम है –आजकल अधिकांश बच्चें इससे अनजान रहते हैं जबकि गालियों के विश्वकोश, जान से मारने के 101 तरीके, खून, ज़ोर-ज़बरदस्ती और विपरीत-लिंगी व्यक्ति के तमाम अंग-प्रत्यंगो की जानकारी से वे बहुत जल्द लैस हो जाते हैं। सूचना-क्रांति के इस दौर का बच्चा अब उतना बच्चा नहीं रहा है जितना हम उसे मानना चाहते हैं।ऐसे में यह ज़रूरी है कि किसी को कानूनन “बच्चा” मानने की उम्र को कम किया जाए। मैं जस्टिस हेगड़े की बात से सहमत हूँ कि आज के ज़माने में यह उम्र 15 वर्ष होनी चाहिए। इसके अलावा मेरे विचार में बच्चों की सज़ा भी उनके अपराध के लिहाज़ से तय होनी चाहिए। दामिनी से बलात्कार करने वाले सत्रह वर्षीय लड़के को तमाम उम्र जेल में रखना चाहिए। शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो दामिनी का बलात्कार इस लड़के का पहला अपराध नहीं है। यह लड़का इससे पहले भी अपराधों में लिप्त रहा है। हमारे बाल-सुधार-गृह बच्चों को सुधारने में कितना कामयाब हो पाते हैं इसके ऊपर एक गंभीर व ग़ैर-सरकारी शोध भी ज़रूरी है।
आज दामिनी के मृत-शरीर को भारत लाया जाएगा। फ़ेसबुक और ट्विटर पर आज केवल दामिनी की ही चर्चा है। कल जब उसका अंतिम संस्कार होगा –तब फ़ेसबुक और ट्विटर दामिनी को दी जाने वाली श्रद्धांजलियों से भरे होंगे…
और परसों?… 

परसों सभी लोग नए वर्ष के उल्लास में डूब जाएंगे… एक दूसरे को “हैप्पी न्यू ईयर” और “सेम टू यू” कहा जाएगा…
उसके अगले दिन तक दामिनी और उसका दर्द शायद एक बीती दास्तां बन चुका होगा।
विदा दामिनी, हो सके तो हमें क्षमा कर देना…
लेखक- ललित कुमार

 

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