‘जिन्दगी रुकने का नाम नहीं चलने का नाम है’
“मां मैं
बहुत दूर जा रहा हूं, शायद ही लौट कर आ पाऊंगा……..” दुनिया की कोई भी मां
यह शब्द नहीं सुनना चाहेगी. किसी ने सच ही कहा है कि दुनिया में सभी को सब
कुछ नहीं मिलता है पर क्या इसका मतलब यह है कि जीवन को खत्म ही कर देना
चाहिए. गंभीर सवाल यह है कि हमारे जीवन में बहुत सारे रिश्ते होते हैं
जिन्हें हम बहुत प्यार करते हैं तो अचानक हमारे साथ ऐसा क्या हो जाता है कि
हम सारे रिश्तों को छोड़ जीवन ही खत्म कर देते हैं.
सोचना ही होगा
जब कोई
आत्महत्या करता है तो हम यह मान लेते हैं कि वह जीवन से हार गया होगा इसलिए
उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया. पर क्या कभी यह सोचा कि जरूर किसी चीज को
बहुत चाहा होगा और जीवन में वो ना मिलने पर आत्महत्या की होगी या उस चीज को
अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य बनाया होगा और उस लक्ष्य की प्राप्ति ना होने
पर ऐसा कदम उठाया होगा. “क्या है आत्महत्या” यह प्रश्न बड़ा गंभीर है.
वास्तव में किसी व्यक्ति का अंतर्तम से स्वीकार कर लेना कि अब उसे यह जीवन
नहीं जीना है और उसके जीवन का अब कोई लक्ष्य नहीं है तब व्यक्ति आत्महत्या
जैसा कदम उठाता है.
रिश्तों से दूरी रही होगी या करीबी
कहते हैं
कि जब रिश्ते आपके साथ होते हैं तो आप कुछ भी गलत करने से पहले हजार बार
सोचते हैं तो क्या जो लोग आत्महत्या करते होंगे वो अपने रिश्तों से दूरी
बना कर रहते होंगे? शायद हां, क्योंकि रिश्तों में कुछ दूरियां तो रही
होंगी, नहीं तो आत्महत्या करने से पहले किसी करीबी को अपना दुख जरूर बताते
और वो करीबी रिश्ता ऐसा करने से उस व्यक्ति को रोक पाता. आत्महत्या करने
वाला व्यक्ति मन की बात शायद मन में ही रखता होगा और अपने दुख को किसी से
भी कहने से डरता होगा. मन की बात मन में ही रख लेने से व्यक्ति मन के किसी
कोने में अपने आप को भीड़ से अलग पाता होगा या उसे यह लगता होगा कि उसके पास
ऐसा कोई रिश्ता नहीं है जिसको अपने मन के अंदर चल रही बात बता सके और बाद
में यही कारण आत्महत्या की वजह बन जाता है.
मन की उलझनें आसानी से नहीं सुलझतीं
आत्महत्या
करने से पहले व्यक्ति अपने मन से हजारों बार लड़ता होगा. वह कहता होगा कि
‘सोच उन रिश्तों के बारे में जो तुझे प्यार करते हैं, जो शायद तेरे इस
दुनिया से जाने के बाद भी तुझे मरा हुआ नहीं मानेंगे फिर क्यों सोचता है उन
लक्ष्यों के बारे में जो तेरे हुए नहीं हैं’. जरा सोचिए उस व्यक्ति की
स्थिति आत्महत्या करने से पहले क्या रही होगी? उसने अपने मन से हजारों बार
लड़ाई लड़ी होगी और ना जाने कितनी बार मन को समझाया होगा कि शायद आत्महत्या
जैसा कदम उठाना गलत है पर फैसला नहीं ले पाया होगा.
”मन भी कितना पागल है, हजारों सवाल करता है, ‘सही-गलत क्या है’ यह नहीं बताता है.” इसी सवाल से शायद आत्महत्या करने वाले लोग गुजरते होंगे.
मनोचिकित्सक
कहते हैं कि वो लोग आत्महत्या करते हैं जो समाज और रिश्तों से दूरी बना
चुके होते हैं. आत्महत्या जैसा कदम वो लोग भी उठाते हैं जो मन की बात मन
में रखते हैं और तन्हां रहकर सोच-विचार करते रहते हैं.
जिन्दगी को खत्म कर देना या जिन्दगी को खुश होकर जीना
जिन्दगी
बहुत खूबसूरत होती है यह तो आपने बचपन से ही सुना होगा. पर जब जिन्दगी अपने
रुख बदलती है तो वो ही खूबसूरत जिन्दगी दुखों का सफर बन जाती है. सवाल यह
उठता है कि क्या जिन्दगी के रुख बदल देने पर जिन्दगी को छोड़ देना चाहिए? सच
तो यह है कि मुश्किलों का समय हमेशा लंबा होता है पर मुश्किलों से बाहर
निकलना सीखना होता है. मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों पर उसका हल आसपास होगा.
मन की बात मन में रखने से बचना होगा और बातें जो हमें दुख देती हैं या
परेशान करती हैं उन बातों को अपनों से बांटना होगा. आत्महत्या करने वाले कई
उलझनों से गुजरते हैं पर इसका मतलब जरा भी यह नहीं कि वो जिन्दगी को ही
खत्म कर दें.
“लड़ना होगा खुद से हजारों बार,
तभी जिन्दगी में राहें मिला करती हैं,
अगर हार गया तू तो निराश मत होना,
क्या भला एक हार से जिन्दगी रुका करती है”
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