अब मैं बोझ नहीं हूं
बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता तो
सदियों से चली आ रही है और दुख तो इस बात का है कि आज भी ये मानसिकता बनी
हुई है. हमारा देश आज 21वीं सदी में जी रहा है पर मानसिकता 18वीं शताब्दी
की है. आज भी लड़की पैदा होते ही मां-बाप के चेहरे का रंग उड़ जाता है. वो
इतने निराश हो जाते हैं मानो उनका सब कुछ छिन गया हो. कहने के लिए तो लोग
कहते हैं कि बेटी ही हमारा बेटा है लेकिन उनका दिल ही जानता है कि वो कितना
सच बोल रहे हैं. खास कर अगर हम गांवों की बात करें तो यहां बेटियां होना
तो पाप से भी बड़ा माना जाता है.
अब हरिया
को ही ले लीजिए. उसको पहले से दो बेटे हैं और अब वो तीसरी बार बाप बनने जा
रहा है. फिर भी वो इतना डरा हुआ है मानो कोई भूत देख लिया हो. उसके चेहरे
पर जो डर था वो भूत देखने से भी ज्यादा भयानक था. उसको ऐसा लग रहा था मानो
उसने एक भी पुण्य किया हो तो भगवान उसकी प्रार्थना सुन लें और बेटी न दें.
ये सोचते सोचते कब उसकी आंख लग गई पता ही नहीं चला फिर अचानक बच्चे की रोने
की आवाज सुन कर उसकी आंख खुली. वो दौड़कर उस कमरे की तरफ गया जहां उसकी
बीवी थी. कुछ देर बाद दरवाजा खुला और एक बूढ़ी महिला बच्चे को ले कर बाहर
आई. उस महिला ने जो कहा उसे सुन कर वो धम से जमीन पर बैठ गया मानो यमदूत ने
उससे उसके प्राण मांग लिए हों.
कुछ देर
बाद वो वहां से उठा और चुपचाप चला गया और काफी देर बाद वो घर लौटा. उसको
देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो भगवान से लड़ कर आ रहा हो. वक्त बीतता गया और
उसकी बेटी बड़ी हो गई. हरिया के दोनो बेटे स्कूल जाते थे पर उसकी बेटी
स्कूल नहीं जाती थी. बीवी के जिद करने पर हरिया ने उसे भी स्कूल भेजना शुरू
कर दिया. एक दिन उसे अपनी बेटी के टीचर से पता चला की सरकार लड़कियों के
लिए बहुत सारी योजनाएं चलाती है ताकि कोई बेटी को बोझ न समझे. ये सुन कर
हरिया का सर शर्म से झुक गया क्यूंकि कभी उसने भी बेटी को बोझ समझा था और
अब हरिया सरकार की योजना का फायदा उठा कर बेटी को अच्छी से अच्छी परवरिश दे
पा रहा है जो वो पैसे के अभाव में नहीं दे सकता था.
योजनाएं
वर्तमान
समय में लोग बेटियों को बोझ नहीं समझें और दुनिया में आने से पहले मारे
नहीं इसलिए दिल्ली सरकार ने भी बहुत सारी योजनाओं की शुरुआत की है जिनमें
से सबसे खास योजना है लाडली योजना.
क्या है लाडली योजना
लाडली
योजना के अंतर्गत दिल्ली के किसी भी अस्पताल/नर्सिंग होम अथवा संस्था में
जन्म लेने वाली बालिका को 11,000 रुपये दिए जाते हैं और यदि बालिका का जन्म
इसके अलावा कहीं और हुआ हो तो उसे 10,000 रुपये दिए जाने का प्रावधान है.
यह धनराशि बालिका के खाते में जमा करवाई जाती है. इसके अलावा कक्षा एक, छह
और नौ में दाखिले के समय भी बालिका के खाते में प्रत्येक बार पांच हजार
रुपये जमा करवाए जाते हैं. कक्षा 10 पास करने पर तथा 12वीं में दाखिला लेने
पर भी 5-5 हजार रुपये इस खाते में जमा करवाए जाने का नियम लाडली योजना में
है. 18 वर्ष की उम्र पूरी करने पर और कक्षा 10 उत्तीर्ण करने के बाद ही
बालिका इस पूरी रकम को ब्याज सहित अपने खाते से निकाल सकती है. दिल्ली
सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की इस योजना का लाभ लेने हेतु आवेदन
पत्र निकटतम सरकारी स्कूल, समाज कल्याण विभाग या भारतीय स्टेट बैंक से
प्राप्त किया जा सकता है.
कितनी लाडलियों ने अब तक उठाया लाभ
लाडली
योजना को दिल्ली सरकार द्वारा सन 2008 में लागू किया गया. जनवरी 2008 और
उसके बाद पैदा हुई लड़कियों को जन्म से ही इस योजना का लाभ मिल रहा है जबकि
2008 से पहले पैदा हुई बालिकाओं को उनके सरकारी स्कूलों में नामांकन के
अनुसार लाभान्वित किया जा रहा है. दिल्ली में पैदा हुई वे सभी लड़कियां इस
योजना का लाभ प्राप्त कर सकती हैं जिनके अभिभावकों की वार्षिक आय एक लाख
रुपये से कम हो और वह कम से कम पिछले तीन साल से दिल्ली में रह रहे हों.
दिल्ली सरकार की सामाजिक योजना लाडली की शुरुआत वर्ष 2008 में की गई थी.
विगत दो वर्षों से अधिक समय में इस योजना की प्रासंगिकता साबित हुई है.
6917 लड़कियों से संबंधित अंतिम दावे के भुगतान के तौर पर 3.7 करोड रुपए की
राशि जारी की गई है.
योजना का उद्देश्य
इस योजना
को लागू करने के पीछे सरकार की सबसे बड़ी मंशा ये है कि कन्या भ्रूण हत्या
पर रोक लगे, लड़कियों को दुनिया में आने दिया जाए और सबसे बड़ी बात की
बेटियों को बोझ नहीं समझा जाए.

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