Monday, 18 February 2013

“मानसिक रोगी नहीं दुखों का रोगी हूं”

“यह जमाना मुझे मानसिक रोगी कहे मुझे इसमें कोई हर्ज नहीं आखिर दुखों का दौर तो सभी ने जिया है”

दुनिया कितनी अजीब होती है, यदि कोई सुख में ज्यादा हंसने लगे तो उसे पागल कहती है और कोई दुख में ज्यादा दुखी होने लगे तो उसे मानसिक रोगी का नाम देती है. बचपन में आपको याद होगा कि जब किसी चीज को बहुत प्यार किया करते थे और उसे हमेशा अपने पास रखना चाहते थे फिर अचानक उसी चीज के टूटने पर दुखी हो जाते थे और खेलना, नाचना-गाना सब बंद कर दिया करते थे. ऐसा ही शायद वो लोग महसूस करने लगते हैं जो अपनी बहुत कीमती चीज को खो देते हैं.

हैरानी होती है हाल ही में आई खबर को देखकर, जिसने समाज को चौंका दिया कि अपने पिता की लाश के साथ एक हफ्ता, एक बंद कमरे में कोई बिता सकता है. मकान संख्या -1139 अब तक तो लोगों को याद हो गया होगा क्योंकि अशोक नगर के इसी मकान में रजनीश तंवर ने अपने पिता विरेंद्र तंवर की लाश के साथ एक हफ्ता अंधेरे में बिताया और वो भी बिना कुछ खाए हुए. जब ऐसी घटना घटती है तो लोग उस व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर का नाम दे देते है और पुलिस उसे मुजरिम का नाम दे देती है.

क्या रजनीश तंवर जैसे लोग मानसिक रोगी होते हैं? हर दुख को सहने की एक  सीमा होती है. रजनीश तंवर अपने बड़े भाई को एक कार हादसे में खो चुका था और उस हादसे के बाद रजनीश की मां की भी मौत हो चुकी थी. रजनीश के पिता उसका एक मात्र सहारा थे जिन्हें खोने का दुख उसे था पर शायद रजनीश सच को समझना नहीं चाहता था.

सच्चाई से दूरी क्यों बना लेते है
बचपन से ही सिखाया गया है कि सच अच्छे के लिए होता है पर कभी-कभी सच   दुख भी देता है. कहते हैं कि सच जैसा भी हो उसे अपना लेना चाहिए पर जिन्दगी के सफर में बहुत बार ऐसे मोड़ आते हैं जहां सच को अपना पाना मुश्किल हो जाता है. शायद उसी स्थिति में वो कुछ लोग खड़े होते हैं जिन्हें दुनिया मानसिक रोगी का नाम देती है.

क्या समाज से भी दूरी है
मानसिक रोगियों के संदर्भ कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्हें देखकर यह लगा कि शायद अब हमारे समाज में दूरियां आ चुकी हैं. हमारे आसपास क्या हो रहा है अब हम जानना ही नहीं चाहते हैं. सुनंदा और सुचित्रा दोनों बहनें तीन महीने से एक घर में बंद थीं. क्या कभी किसी का भी ध्यान उस बंद घर की तरफ नहीं गया? सच में ऐसी घटनाओं को देखते हुए लगता है कि आज समाज और हमारे बीच में मीलों फासले हैं. 

घटनाएं कुछ कहती हैं……….
हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ में एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया था जब एक बेटी अपने पिता की लाश के साथ एक महीने तक बैठकर रोती रही. उस लड़की का नाम परमजीत था जिसने बचपन में ही अपनी मां को खो दिया था. पर क्या परमजीत आपकी नजरों में मानसिक रोगी है? क्या पुलिस को परमजीत के लिए हिरासत में लेने जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए. निठारी कांड आपको याद होगा और एक रिटायर्ड फौजी का नौ वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म करने जैसी घटना भी आपको याद होगी. लेकिन इन दोनों घटनाओं में व्यक्ति मानसिक रोगी नहीं मुजरिम हैं इसे भी साफ करना जरूरी है.

रिपोर्ट और मनोचिकित्सक क्या कहते हैं
देश में हर एक हजार में 65 लोग मानसिक समस्या की गिरफ्त में हैं और लगभग इस मानसिक रोग से जूझ रहे लोगों की संख्या सात करोड़ से अधिक है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो ‘एनसीआरवी’ की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार मानसिक रूप से जूझ रहे नौ हजार व्यक्तियों में से 465 लोगों ने आत्महत्या की.

मनोचिकित्सकों की राय में जब किसी व्यक्ति की भावनाएं, विचार अथवा व्यवहार दूसरे लोगों के लिए समस्या बन जाए तो यह उस व्यक्ति के मानसिक बीमारी से ग्रस्त होने के लक्षण हो सकते हैं लेकिन समुचित जानकारी के अभाव में लोग इस ओर ध्यान नहीं देते जिससे समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है.  मनोचिकित्सकों के लिए आज भी यह पता लगाना एक चुनौती है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रस्त है तो उसकी बीमारी आखिर क्या है.

आखिरकार सच क्या है
सभी बातों को ध्यान से देखा जाए और समझा जाए तो ‘मानसिक रोगी’ शब्दों को प्रयोग में लाना सही नहीं लगेगा. सच यह है कि जब दुख की सीमा ही नहीं रहती है और जिन्दगी में रिश्ते खोने का एक सिलसिला चल पड़ता है तो शायद सच्चाई को अपना पाना मुश्किल हो जाता है. सही कहा है किसी ने ‘मैं जिन्दगी के सफर में रुका ना होता, अगर मेरे वक्त ने मेरा साथ दिया होता’.




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