Monday, 18 February 2013

कितना सही है किराए की कोख का चलन

mother-and-child-1aकहते हैं मातृत्‍व, एक स्‍त्री के जीवन का सबसे खूबसूरत अहसास होता है। बच्‍चे की पहली किलकारी, नन्‍हें पैरों से लिए पहले कदम और उसकी तोतली जुबान से मां सुनना, एक स्‍त्री के लिए कभी न भूलने वाले पल होते हैं जिन्‍हें वह हमेशा अपने दिल में संजो कर रखती है। पर गर्भाशय में संक्रमण के कारण कुछ स्त्रियां इस अहसास के लिए तरसती रह जाती हैं। ऐसे में ‘सरोगेसी’ एक बेहतरीन चिकित्‍सा विकल्‍प है जिसमें वंध्‍य जोड़े किसी अज्ञात महिला या अन्य जानकारी की सहायता से संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। 

read ओनलैन कुंडली   


सरोगेसी का शाब्दिक अर्थ- सरोगेसी शब्‍द लैटिन शब्‍द ‘सबरोगेट’ से आया है जिसका अर्थ होता है किसी और को अपने काम के लिए नियुक्‍त करना।

सरोगेसी के प्रकार
सरोगेसी कई तरह की होती है जैसे:

ट्रेडिशनल सरोगेसी- इस पद्धति में संतान सुख के इच्‍छुक दंपत्ति में से पिता के शुक्राणुओं को एक स्‍वस्‍थ महिला के अंडाणु के साथ प्राकृतिक रूप से निषेचित किया जाता है। शुक्राणुओं को सरोगेट मदर के नेचुरल ओव्‍युलेशन के समय डाला जाता है। इसमें जेनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है।

जेस्‍टेशनल- इस पद्धति में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्‍चेदानी में प्रत्‍यारोपित कर दिया जाता है। इसमें बच्‍चे का जेनेटिक संबंध मां और पिता दोनों से होता है। इस पद्धति में सरोगेट मदर को ओरल पिल्‍स खिलाकर अंडाणु विहीन चक्र में रखना पड़ता है जिससे बच्‍चा होने तक उसके अपने अंडाणु न बन सकें।

सरोगेसी से जुड़े विवाद 


आज सरोगेसी एक विवादास्‍पद मुद्दा है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें सरोगेट मदर ने बच्‍चा पैदा होने के बाद भावानात्‍मक लगाव के कारण बच्‍चे को उसके कानूनी मां-पिता को देने से इंकार कर दिया। बच्‍चा विकलांग पैदा हो जाए या फिर करार एक बच्‍चे का हो और जुड़वा बच्‍चे हो जाएं तब भी कई तरह के विवाद सामने आए हैं जिसमें जेनेटिक माता-पिता द्वारा बच्‍चे को अपनाने से इंकार भी शामिल है।

खैर विवाद चाहे कुछ भी हो पर यह एक निर्विवाद सत्‍य है कि सेरोगेसी न केवल निःसंतान दंपत्ति को बल्कि समलैंगिक लोगों को भी मां या पिता बनने का सुखद अहसास कराने में मदद करती है। पर साथ ही यह एक प्रश्‍न भी है कि दूसरे का बच्चा जनने वाली औरत यानि सरोगेट मदर का बच्‍चे के प्रति भावनात्‍मक प्रेम क्‍या कानूनी कागजों में दस्‍तखत करा के खत्‍म किया जा सकता है।

सेरोगेसी (किराए की कोख) के लिए बड़ी संख्या में निःसंतान दंपति भारत का रुख कर रहे हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक व्यावसायिक सरोगेसी के लिए भारत को तरजीह दी जा रही है। इसके बाद थाइलैंड और अमेरिका का नाम आता है। दरअसल, भारत में किराए की कोख के जरिए अभिभावक बनने का सपना पूरा करना काफी सस्ता पड़ता है इसलिए उसे  वरीयता दी जा रही है। 



अंतरराष्ट्रीय सेरोगेसी एजेंसी सेरोगेसी ऑस्ट्रेलिया के हवाले से अखबार ‘द हेराल्ड सन’ ने कहा, इस साल अब तक भारत में ऑस्ट्रेलिया युगलों के लिए 200 बच्चों का जन्म सेरोगेसी के जरिए हुआ। जबकि 2011 में यह आंकड़ा 179, 2010 में 86 और 2009 में 46 था। सर्वेक्षण में ऑस्ट्रेलिया सरकार के आंकड़ों और 14 वैश्विक सरोगेसी संस्थाओं के आंकड़ों को शामिल किया गया है। भारत में किराए की कोख लेने का खर्च 77 हजार डॉलर करीब 42 लाख 87 हजार रुपयेवहीं अमेरिका में इसके लिए एक लाख 76 हजार डॉलर करीब 98 लाख रुपये) खर्च करने पड़ते हैं। सर्वेक्षण में 217 ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को शामिल किया गया। इनमें 50 प्रतिशत लोगों ने सरोगेसी के लिए बैंक से ऋण लिया। 45 प्रतिशत ने अपने खर्च में कटौती की। कुछ ने अपने रिश्तेदारों से उधार लिया या अपनी संपत्ति बेच दी। सेरोगेसी संस्था के प्रमुख ने बताया कि बच्चे की चाहत में सेरोगेट मां की व्यवस्था करने के लिए बहुत लोग भारत का रुख करते हैं।

कितना जायज है यह सौदा

भारत में किराये की कोख के संबंध में कोई कानून नहीं होने के कारण किराये की कोख सबके लिये उपलब्ध है। विदेशी दम्पति भारत आते हैं और किराये की कोख के जरिये बच्चे प्राप्त करते हैं और विदेश चले जाते हैं। लेकिन अगर किराये पर कोख देने वाली महिला की प्रसव के दौरान मौत हो जाये या एक से अधिक बच्चे का जन्म हो तो क्या होगा। किराये पर कोख लेने वाले दम्पतियों की जरूरत क्या वाकई जायज है। इस बात पर भी आशंका है कि किराये की कोख से पैदाहोने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंगों की खरीद-फरोख्त या देह व्यापार के लिये भी हो सकता है।

भारत में किराये की कोख के व्यापार के फलने-फूलने का एक बड़ा कारण भारत के एक बडे़ तबके का आर्थिक रूप से कमजोर होना भी है, साथ ही भारत में अपेक्षाकृत कम खर्चीली चिकित्सा सुविधायें भी विदेशियों के इस और खिंचाव का एक प्रमुख कारण है। दिल्ली सहित भारत के तमाम हिस्सों में ऐसे अस्पताल आसानी से मिल जाते हैं जहां किराये पर कोख देने वाली महिलाओं का इंतजाम कराया जाता है एवं किराये की कोख से बच्चे को जन्म दिया जाता है। 



वैसे तो सेरोगेसीकी परम्परा महाभारत जितनी पुरानी है। सरोगेसी का पहला मामला अमरीका में 1985 में सामने आया था। यूं तो 1970 के दशक से ही आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक का प्रयोग कृत्रिम गर्भधारण के लिए किया जा रहा है। परंतु हाल के वर्षो में भारत में कृत्रिम गर्भधारण के बढ़ते मामलों और ‘सरोगेटेड मदर’ की अवधारणा के प्रचार बढ़ने से इस विषय पर कानूनविदों और समाजशास्त्रियों में बहस छिड़ गई है।

व्यापार का रूप ले चुके इस कथित उपकार ने नव धनाढ्यों के लिए भी एक अतिरिक्त विकल्प का काम किया है। अब अपने काम या आराम में व्यस्त धनी महिलायें सरोगेट मदर के जरिये अपने परिवार के लिए बच्चे हासिल कर सकती हैं। मां बनने के इस अतिरिक्त विकल्प ने फैशन और ग्लैमर की दुनिया में एक वरदान का काम किया हैं।

ऐसा देखा जाता है कि गर्भ के दौरान मां का बच्चे के साथ एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता हैं जो उम्रभर बना रहता है, मगर सरोगेसी के जरिये पैदा बच्चे के साथ ऐसा कोई रिश्ता जुड़ना मुश्किल होता है। ऐसे में बच्चे पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में इस व्यापार के और तेज होने तथा बच्चे की चाह में और अधिक संख्या में विदेशी दम्पतियों के भारत आने की संभावना है।


सरोगेसी विशेषज्ञ डा. इंदिरा हिंदुजा कहती हैं कि अब सेरोगेसी को लेकर लोगों की झिझक दूर हो रही है। अब लोग ज्यादा खुल रहे हैं। मगर सेरोगेसी का बढ़ता प्रचलन अनाथ बच्चों को गोद लेने की प्रवृति को हतोत्साहित करेगा और अनाथ बच्चों के भविष्य पर सवाल खड़ा करेगा !!!!!!!!



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