Monday, 18 February 2013

ऐसे बच सकती थी दामिनी

                            ऐसे बच सकती थी दामिनी  



यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है कि आप किसी सभा को संबोधित करते हुए क्या कहते हैं और वो किस तरह से समाज और श्रोताओं को प्रभावित करता है. बोलने में बहुत ही ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि वह शब्द कहीं ऐसे ना साबित हो जाएं जो आपको ही संकट में डाल दें. अपनी बात को इस प्रकार से कहना समाज को कितने अशोभनीय संकेत प्रदान करता है इसका फैसला तब ही होता है जब आप उस अवस्था के खुद भुक्तभोगी होते हैं. धर्मगुरु आसाराम बापू द्वारा दिया गया बयान ‘किस तरह से बेबुनियाद है’ इसका सामना उनको करना पड़ रहा है. दिल्ली सामूहिक बलात्कार के मामले के संबध में दिया गया उनका बयान कितना बेकार किस्म का है इसकी चर्चा आज पूरे देश में हो रही है. 


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मैं इसके खिलाफ हूं!!: आसाराम बापू का यह कहना कि इस मामले में पीड़िता भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि यह अपराध करने वाले पर फिर भी उनका कहना है कि दोषियों को कड़ी सजा नहीं होनी चाहिए. आसाराम बापू को अगर जीवन और आज के समाज की सही मायने में समझ होती तो वो इस तरह का बयान कभी नहीं देते, उनके अनुसार यह दुष्कर्म करते समय अगर अपराधियों को पीड़िता “भाई” का दर्जा देती तो इस प्रकार की हैवानियत की शिकार नहीं बनी होती. आसाराम बापू के कहने के मुताबिक अगर वो दूसरे का हाथ पकड़ कर कहती कि मैं असहाय हूं और अन्य से कहती तुम तो मेरे धार्मिक भाई हो तो उसका इस प्रकार शोषण ना हुआ होता. उनका काम था कहना उन्होंने कह दिया पर जिस प्रकार की स्थिति आज हमारे समाज की है क्या वहां मात्र भाई कह देने से सारी उलझन सुलझ जाएगी? अगर इस प्रकार का मानसिक चिंतन और सोचने का नजरिया उन अपराधियों का होता तो क्या वो इस तरह का कुकृत्य करते? आसाराम बापू के अनुसार पीड़िता को उनसे रुक जाने की प्रार्थना करनी चाहिए थी शायद उनका मन बदल जाता. इस प्रकार का बयान देकर कहीं आसाराम बापू नारी को नीचा दिखाने और पुरुष के अधीन रहने की बात तो नहीं कह रहे हैं!!






rape 2पुरुष प्रधान समाज की ओर: जहां इस मुद्दे पर अब कार्यवाही भी शुरू हो गई है और फास्ट ट्रैक कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है वहीं इस प्रकार का बयान देना कि अपराधियों को सजा नहीं होनी चाहिए इस समाज पर कुठाराघात करता है. आसाराम बापू के अनुसार पीड़िता को उनसे प्रार्थना करनी चाहिए थी और यह फरियाद लगानी चाहिए थी कि वो उसे छोड़ दें – उनका यह कथन एक पुरुष प्रधान समाज का उदाहरण सा लगता है जो फिर से भारतीय समाज को वहीं ले जा रहा है जहां इससे निकलने के लिए कई सारे आंदोलन किए गए थे. उनका यह भी कहना था कि छः नशे में धुत लोग जब उसके सामने थे तो उसको ईश्वर का नाम लेना चाहिए था. जो अपनी नैतिकता भूल चुका हो उसके सामने किसी का नाम लेना उतना ही बेकार है जितना कि भारत में अपराध के खिलाफ मुंह खोलना और सियासत पर अंगुली उठाना. दूसरी तरफ आसाराम बापू के इस बयान पर सारे राजनैतिक दलों के साथ-साथ महिला आयोग भी कड़े तेवर दिखा रहा है. भाजपा का कहना है कि आसाराम बापू धार्मिक गुरु हैं और उनको सारा देश देखता है अतः उन्हें इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था जो देश और समाज की भावनाओं पर चोट करे. वहीं आसाराम बापू के अनुवाई इस मुहिम में लग गए हैं कि किस प्रकार इस पूरे बयान को तोड़-मरोड़ कर परोसा जाए. भारत एक धार्मिक देश है वहां इस प्रकार का बयान और वो भी एक धार्मिक गुरु के द्वारा बहुत ही शर्मनाक है. 

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