ऐसे बच सकती थी दामिनी
यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है कि आप
किसी सभा को संबोधित करते हुए क्या कहते हैं और वो किस तरह से समाज और
श्रोताओं को प्रभावित करता है. बोलने में बहुत ही ज्यादा सावधानी बरतने की
जरूरत होती है क्योंकि वह शब्द कहीं ऐसे ना साबित हो जाएं जो आपको ही संकट
में डाल दें. अपनी बात को इस प्रकार से कहना समाज को कितने अशोभनीय संकेत
प्रदान करता है इसका फैसला तब ही होता है जब आप उस अवस्था के खुद भुक्तभोगी
होते हैं. धर्मगुरु आसाराम बापू द्वारा दिया गया बयान ‘किस तरह से
बेबुनियाद है’ इसका सामना उनको करना पड़ रहा है. दिल्ली सामूहिक बलात्कार के
मामले के संबध में दिया गया उनका बयान कितना बेकार किस्म का है इसकी चर्चा
आज पूरे देश में हो रही है.
Read vigyan
मैं इसके खिलाफ हूं!!:
आसाराम बापू का यह कहना कि इस मामले में पीड़िता भी उतनी ही जिम्मेदार है
जितना कि यह अपराध करने वाले पर फिर भी उनका कहना है कि दोषियों को कड़ी सजा
नहीं होनी चाहिए. आसाराम बापू को अगर जीवन और आज के समाज की सही मायने में
समझ होती तो वो इस तरह का बयान कभी नहीं देते, उनके अनुसार यह दुष्कर्म
करते समय अगर अपराधियों को पीड़िता “भाई” का दर्जा देती तो इस प्रकार की
हैवानियत की शिकार नहीं बनी होती. आसाराम बापू के कहने के मुताबिक अगर वो
दूसरे का हाथ पकड़ कर कहती कि मैं असहाय हूं और अन्य से कहती तुम तो मेरे
धार्मिक भाई हो तो उसका इस प्रकार शोषण ना हुआ होता. उनका काम था कहना
उन्होंने कह दिया पर जिस प्रकार की स्थिति आज हमारे समाज की है क्या वहां
मात्र भाई कह देने से सारी उलझन सुलझ जाएगी? अगर इस प्रकार का मानसिक चिंतन
और सोचने का नजरिया उन अपराधियों का होता तो क्या वो इस तरह का कुकृत्य
करते? आसाराम बापू के अनुसार पीड़िता को उनसे रुक जाने की प्रार्थना करनी
चाहिए थी शायद उनका मन बदल जाता. इस प्रकार का बयान देकर कहीं आसाराम बापू
नारी को नीचा दिखाने और पुरुष के अधीन रहने की बात तो नहीं कह रहे हैं!!
No comments:
Post a Comment