Monday, 18 February 2013

गलती करने पर लड़कों के साथ कमरे में बंद कर दिया जाता है

हॉस्टल की छात्राएं जब कभी गलती करती हैं तो उन्हें सजा के तौर पर लड़कों के हॉस्टल भेज दिया जाता है. जांच अधिकारियों को एक पीड़ित छात्रा ने बताया कि सीनियर मैडम गलती करने पर उन्हें लड़कों के हॉस्टल भेज देती थीं, जहां उनके साथ हर गलत काम किया जाता था.

बेहद घिनौनी और दिल को दहला देने वाली यह घटना भारत का दिल कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश की है जहां मूक-बधिर और मानसिक रूप से कमजोर लड़कियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जो इंसानियत को भी शर्मसार कर हमें यह सोचने को विवश कर दे कि क्या वाकई हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जिसमें इंसानियत नाम की कोई चीज ही नहीं बची है.


हाल ही में एक ऐसी घटना प्रकाश में आई है जिसका सीधा संबंध फिर से एक बार महिला उत्पीड़न से है. सिहोर (मध्य प्रदेश) में मानसिक रूप से कमजोर छात्राओं को सजा देने के नाम पर उन्हें लड़कों के हॉस्टल में भेज दिया जाता है जहां उनके साथ अमानवीय तरीके से मारपीट और शारीरिक शोषण किया जाता है.

मध्य प्रदेश के ही एक एनजीओ द्वारा संचालित इस गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियां हर दिन डर के साये में जीने को मजबूर हैं कि ना जाने कब उन्हें सजा दे दी जाए और भेज दिया जाए उन लड़कों के पास जिनके लिए उनका शरीर एक ऐसा खिलौना है जिसके साथ जैसे मर्जी खेला जा सकता है, जैसी मर्जी वैसा व्यवहार किया जा सकता है, मारा जा सकता है, उत्पीड़न किया जा सकता है और ना जाने किस-किस तरीके से उन्हें अपनी दरिंदगी का शिकार बनाया जा सकता है.

ब्राइट स्टार सोशल सोसायटी नामक इस एनजीओ पर स्टेट कमीशन फॉर चाइल्ड राइट्स ने छापामारी की तो पिछले काफी समय से हॉस्टल के भीतर चल रही इस गड़बड़ी का खुलासा हुआ. छापेमारे में सभी लड़कियों को मुक्त करवाया गया.

पीड़ित लड़कियों का कहना था कि उन्हें गलत काम करने के लिए मजबूर कर दिया जाता था और बहुत बुरी तरह मारा-पीटा भी जाता था. मामूली गलती के लिए भी लड़कों के हॉस्टल भेज दिया जाता था. हॉस्टल में 48 लड़कियां रहती थीं लेकिन जब छापेमारी की गई तो उनमें से 18 लड़कियां गायब मिलीं और जो बची हुई 30 छात्राएं थीं उन्हें एक छोटे से कमरे में बंद कर रखा गया था, जिसकी वजह से उनकी हालत बहुत खराब थी.

स्टेट कमीशन फॉर चाइल्ड राइट्स को यह शिकायत मिली कि हॉस्टल में रहने वाली असहाय बच्चियों के साथ ऐसे कृत्य किए जाते हैं. संस्था के सचिव ने एक लड़की जिसने छोटी सी गलती की थी, को सजा देने के लिए लड़कों के हॉस्टल ले जाने के बहाने अपने साथ अपने परिवार के साथ सुरक्षित तौर पर रखा और फिर चाइल्ड राइट्स में यह शिकायत दर्ज करवाई थी. चाइल्ड राइट्स की चेयर पर्सन ने जब सभी आरोपों की जांच की तो उन्होंने प्रत्येक आरोप को सही पाया. हालांकि मामले की गंभीरता को समझते हुए चाइल्ड राइट्स संस्था की चेयर पर्सन ने जांच के आदेश दे दिए हैं और सभी छात्राओं को मेडिकल टेस्ट के लिए भेज दिया है.



लड़कियों के साथ हो रही उत्पीड़न की घटनाओं के विरुद्ध हम भले ही अपनी आवाज कितनी ही बुलंद क्यों ना कर लें लेकिन ऐसी घटनाएं हमें यह सोचने को विवश कर देती हैं कि क्या कभी महिलाएं, जो आधिकारिक तौर पर उतनी ही सम्मान की पात्र हैं जितना कि एक पुरुष है, को कभी सामाजिक रूप से सम्मान मिल पाएगा या नहीं? महिलाएं जिन्हें पुरुषों का पूरक कहकर संबोधित किया जाता है उन्हें पुरुषों के ही समान अहमियत दी जाएगी भी या नहीं?

हम चाहे इस बात को नकार दें लेकिन जब तक महिला की देह को मात्र एक भोग की वस्तु मानकर ही उसके साथ व्यवहार किया जाएगा तब तक तो शायद ऐसा हो पाना असंभव ही है.

आखिर क्यों नहीं पसीजता समाज का दिल ?

हाल ही में दिल्ली में हुए वीभत्स और खौफनाक गैंग रेप की घटना ने भले ही देश के युवाओं के साथ-साथ अन्य सभी वर्गों के लोगों को महिलाओं के विरुद्ध दिनोंदिन बढ़ते अपराधों के के लिए जागरुक किया हो लेकिन आपको शायद यह नहीं पता होगा कि दिल्ली की दामिनी से पहले ही सीकर (जयपुर) में एक ऐसी ही घटना को अंजाम दिया गया था जिसमें कुछ हैवानों ने 11 वर्ष की मासूम बच्ची को अगवा कर वहशीपन को अंजाम दिया.

बीते साल 20 अगस्त को घटी इस घटना को मीडिया हाइप ना मिल पाने के कारण उस मासूम बच्ची के दर्द को किसी ने भी नहीं समझा जिसके साथ इंसानियत की सभी हदें पार कर गैंग रेप किया गया. 11 वर्ष की इस मासूम को सीकर के ही बस स्टैंड से अगवा किया. उसके साथ गैंग रेप करने के बाद उन हैवानों ने उस बहुत मारा-पीटा और उसके गुप्तांगों को चोट पहुंचाई.

बच्ची के साथ इस वहशीपन को अंजाम देने के बाद इंसान के रूप में उन भेड़ियों ने उसे शहर के बाहरी हिस्से में फेंक दिया. जख्मी हालत में जब उस मासूम को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया तो वहां उसका चेक-अप करने के बाद डॉक्टरों ने कहा कि उसका प्राइवेट पार्ट्स पूरी तरह से बेकार हो गया है. 6 बड़ी और 8 छोटी सर्जरी करने के बाद भी उस बच्ची की हालत अभी भी नाजुक बनी हुई है.


उल्लेखनीय है कि 22 अगस्त, 2012 को जब उस बच्ची को जयपुर के अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टर भी उसकी हालत देखकर कांप गए थे. डॉक्टरों का कहना था कि बच्ची का अत्याधिक बर्बर तरीके के साथ बलात्कार किया गया है. मांसपेशियों का कोई भी विभाजन उसकी योनि और मलाशय के बीच नहीं छोड़ा गया है.


ऑपरेशन के लिए उसकी बड़ी आंत का एक हिस्सा नए मलाशय को बनाने के लिए और कॉलोस्टॉमी सर्जरी के लिए लेना पड़ा. डॉक्टरों का कहना है कि कॉलोस्टॉमी सर्जरी से शौच इत्यादि का वैकल्पिक रास्ता बनाया गया. सर्जरी टीम में शामिल वरिष्ठ डॉक्टर एल. डी. अग्रवाल का कहना है कि इस बच्ची को बचाने के लिए उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है.


बिहार के दरभंगा की रहने वाली यह लड़की अपने पिता की मौत के पश्चात इस उम्मीद से कि सीकर में रहने वाले उसके रिश्तेदार उसके परिवार को काम दिलवाने में सहायता करेंगे, कुछ समय पहले अपनी मां और बड़े भाई-बहनों के साथ सीकर आ गई थी. लेकिन किसे पता था यहां उसके साथ वह होगा जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए.

इस भयानक हादसे के बाद बच्ची ने किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देना ही बंद कर दिया है. वह ना किसी बात पर खुश होती है और ना ही दुखी. अन्य बच्चों की तरह पहले यह भी इंजेक्शन को देखकर डरती थी लेकिन अब उसे कितने ही इन्जेक्शन क्यों ना लग जाए वह कुछ नहीं कहती. शारीरिक और मानसिक रूप से उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है जिसका अंदाजा तक नहीं लगाया जा सकता.


बच्ची की ऐसी स्थिति के बावजूद स्थानीय पुलिस का रवैया बेहद शर्मनाक है. परिवार के एक सदस्य का यह स्पष्ट कहना है कि इस घटना को लेकर पुलिस गंभीर नहीं है. पहले तो पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज करने से मना कर दिया था. स्थानीय लोगों ने जब विरोध में मार्च निकाला तब कहीं जाकर पुलिस की नींद टूटी.


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से गंभीरता से उस मुद्दे पर बात की तब जाकर प्रशासन ने अपनी कार्यवाही तेज की.


लेकिन फिर भी वह मासूम इंसाफ के इंतजार में है. गैंग रेप के आरोप में 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया है लेकिन आइपीसी की मामूली धाराएं लगाने के कारण 2 आरोपियों को जमानत भी मिल गई. पीड़िता के रिश्तेदारों का कहना है कि आरोपी राजनीतिक रूप से काफी मजबूत हैं.


महानगर से संबंधित होने के कारण दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना तो सभी के जहन में घर कर गई लेकिन दिल्ली की दामिनी अकेली ऐसी महिला नहीं थी जो वहशीपन का शिकार हुई. ना जाने कितनी ही मासूम लड़कियां हर रोज दरिंदों की हैवानियत का शिकार हो रही हैं लेकिन उनके दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है.


 

हिंदुस्तानी कपड़े त्याग सकते हैं, परंपराएं नहीं

 हिंदुस्तानी कपड़े त्याग सकते हैं, परंपराएं नहीं 



सेलम में रहने वाली तीन बच्चों की मां, एक पेशेवर सेक्स वर्कर, काम के दौरान मंगलसूत्र पहने दिखती है. कोट्टयम (केरल) के लोग मसाज के लिए रिफाइंड नारियल तेल पसंद करते हैं. मिजो समाज में प्रणय निवेदन का एक रिवाज है जिसे इन रिमकहते हैं. इसमें विवाह का इच्छुक लड़का किसी लड़की से मिलने उसके घर जा सकता है और बड़े-बुजुर्गों की निगरानी में उसके साथ कुछ समय बिता सकता है. अब आइजॉल के लड़के-लड़कियां बिना अभिभावकों की निगरानी में मिलते हैं.

उपरोक्त पंक्तियां उसी समाज की सच्चाई हैं जिसे हम परंपराओं का पक्का और शारीरिक संबंधों के मामले में गंभीर देश मानते हैं. भारत एक ऐसे समाज के तौर पर अपनी पहचान स्थापित किए हुए है जहां के लोग बेहद शालीन और मान्यताओं के विषय में संजीदा हैं. लेकिन क्या बदलते समय के साथ भी हमारी यह सभी विशेषताएं प्रासंगिक हैं या फिर अन्य सभी विशेषताओं की तरह यह भी इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई हैं?


नीचे हम आपको कुछ ऐसे तथ्यों से अवगत करवाने जा रहे हैं जिन्हें पढ़ने के बाद आपको यही लगेगा कि परंपराओं को गले से लगाने वाले भारतीयों के लिए आज वही परंपराएं एक ऐसी फांस बन गई हैं जिससे वे छुटकारा तो नहीं पा सकते लेकिन अपनी निजी प्राथमिकताओं और स्वार्थ के लिए उन्हें दरकिनार जरूर कर देते हैं.

कहने को तो देश के बड़े-बड़े राज्य और महानगरों में रहने वाले लोग बहुत मॉडर्न होते हैं और इसी वजह से वह अपनी मान्यताओं से दूर होते जा रहे हैं लेकिन देश के छोटे राज्यों यहां तक कि गांवों के लोगों पर हुआ एक सेक्स सर्वे यह बात प्रमाणित कर देगा कि अब छोटे शहर के लोग भी उतने भोलेभाले नहीं रहे जितना कभी हुआ करते थे.

इंडिया टुडे और नील्सन द्वारा हुए इस सेक्स सर्वे में चार महानगरों और 12 छोटे शहरों के 5,246 पुरुषों और महिलाओं ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं. 63 फीसदी के साथ कोटा (राजस्थान) गुदा मैथुन (एनल सेक्स) करने वाले लोगों से भरा हुआ है, वहीं जामनगर (गुजरात) ब्लाइंड डेट पर जाने वाले और साथ ही ओरल सेक्स आजमाने जैसी श्रेणी में शीर्ष पर है. वहीं मध्य प्रदेश का छोटा का शहर रतलाम थ्रीसम के मामले में सबसे आगे है. कोट्टायम के लोग ताकत बढ़ाने जैसी दवाओं को खाने में अव्वल हैं तो वहीं आसनसोल के भी 10 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि पति-पत्नी की अदला-बदली करना उन्हें स्वीकार्य है.


इस अध्ययन ने हमारी उस मानसिकता को पूरी तरह हिला कर रख दिया है जिसके अनुसार छोटे शहरों के लोग शारीरिक संबंधों के मामले में ज्यादा विस्तृत होकर नहीं सोचते बल्कि आधुनिकता और सुविधाओं के निकट होने के कारण बड़े शहर के लोगों में शारीरिक संबंधों के प्रति जिज्ञासा अधिक होती है.

हम भले ही अपनी परंपराओं का बोझ अपने सिर पर ढोए आगे बढ़ते जा रहे हैं लेकिन एक हकीकत यह भी है कि शायद अब किसी से यह बात छिपी नहीं रही है कि अब बदलते समय के साथ-साथ भारत के लोग भी सेक्स जैसे विषय को लेकर थोड़ा खुलकर सोचने लगे हैं.


शराब के नशे में कब तक बिकती रहेंगी बेटियां

तमाम कार्यवाहियों और प्रदर्शनों के बाद आज भी महिलाओं के खरीद-फरोख्त का व्यापार पूर्ववत फल-फूल रहा है. महिलाओं को बस उपभोग की नजरों से देखने वाला यह पुरुष समाज उसकी भावनाओं और आपबीती को कभी समझ नहीं पाएगा. उसके दर्द को कभी अपना नहीं समझ पाएगा क्योंकि यह दर्द भी उसी ने जो दिया है. महिला सशक्तिकरण, महिलाओं की स्थिति में सुधार आदि सब धरा का धरा रह जाता है जब जन्म देने वाला पिता ही अपनी मासूम बेटी की इज्जत का सौदा कर देता है.

हाल ही की एक बेहद शर्मनाक घटना से हम आपको परिचित करवाने जा रहे हैं जहां एक पिता ने चंद पैसों के लिए अपनी नाबालिग बेटी का सौदा कर डाला.


घटना है जालंधर (पंजाब) की है जहां महज 50 हजार रुपए के लालच में एक बाप ने अपनी बेटी को हैवानों के हाथों बेंच डाला. इतना ही नहीं जब बेटी ने अपने साथ होते इस अन्याय का विरोध करना चाहा तो उसके साथ मारपीट के साथ-साथ गंभीर रूप से प्रताड़ित भी किया गया. यह सब उसी इंसान की आंखों के सामने हुआ जिसने उसे पैदा किया था. पीड़ित लड़की तो अभी तक इस सदमे से उभर नहीं पाई है लेकिन उसकी बड़ी बहन का कहना है कि उनके पिता शराब पीने के आदी हैं और मां की मृत्यु की पश्चात शराब की लत और बढ़ गई थी.


पीड़िता पांच-भाई बहनों में सबसे छोटी है. पीड़िता की बहन ने बताया कि कुछ दिन पहले शराब के नशे में जब उनके पिता घर आए और 14 वर्षीय मेरी बहन को कहने लगे कि कल तुझे देखने लड़के वाले आएंगे और तुझे उसी से शादी करनी है. परिवार और पीड़िता के विरोध के बावजूद उसका विवाह अपने से 15 साल बड़े युवक से कर दिया गया.


अस्पताल में भर्ती पीड़िता का कहना है कि विवाह से इंकार करने पर उसके पिता ने उसके साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी भी दी. बहुत से लोग कहेंगे या सोचेंगे कि लाचारी और गरीबी से तंग आकर ही एक बाप अपनी बेटी को बेच सकता है. कोई खुशी-खुशी ऐसा क्यों करेगा? तो यहां सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों हर बार कमजोरियों, लाचारियों का नाम लेकर हमेशा और हर बार एक बेटी के ही जीवन के साथ खिलवाड़ क्यों किया जाता है?

आखिर क्यों मां-बाप एक बेटी को ही अपनी सभी परेशानियों की जड़ समझते हैं या फिर क्यों उसके शरीर का सौदा कर खुद को जिम्मेदारियों से आजाद समझते हैं?

माता-पिता यह क्यों भूल जाते हैं कि उस कोमल शरीर के भीतर छिपे मासूम से दिल के भी कुछ अरमान हैं जो पंख लगाकर उड़ना चाहते हैं, वह भी खुली हवा में सांस लेना चाहती है, तो क्यों उसे अपने कांधे का बोझ समझकर जैसे-तैसे बस उतारने का ही प्रयत्न किया जाता है? उसे बेच दिया जाता है उन लोगों के हाथों जिनका सरोकार सिर्फ उसके जिस्म से है, उसकी आत्मा, उसकी भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है? इस क्यों का जवाब आपके और हमारे अंदर छिपा है जरूरत है तो बस इसे खंगालकर बाहर निकालने की.

नजीबा का नसीब – आंतक का घिनोना चेहरा |

जनरल डब्बा, न्यूज़ बर्थ, सोशल इश्यू में
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अफगानिस्तान के राज्य परवान गाँव कोई में आंतकियों ने कैसे ऐ के – ४७ चला २२ SAl की एक अबला और असहाय औरत नजीबा को गोलियों से छलनी कर मार डाला | यह दरिंदगी नहीं तो क्या है | क्या इस्लाम और दुसरे मजहबों में नजीबा जैसी अबला और असहाय औरतों का यही नसीब है ?
जैसे इस्लाम यशु को भी मसीहा मानता है | भगवान यशु अर्थात मसीहा यशु ने कहा था हाँ जमीन में कमर तक गाड़ी हुई बेबस औरत को पत्थर मरने का अधिकार उसको है जिसने कभी कोई पाप न किया हो | जिस आंतकी ने उस औरत से नाजायज़ सम्बन्ध बनाये औरत की जगह उसके हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना चाहिए था | परन्तु काफ़िर और कायर आंतकी खावंद ने अपनी औरत की इज्ज़त ख़राब करने का बदला नहीं लिया और बेशर्मी से जी रहा है | थू है उसके मूह पर और धिक्कार है उसकी मर्दानगी पर |
करीबन दो साल पहले सहारनपुर साईड की तरफ एक ससुर ने बहु-बिटिया की इज्ज़त लूट ली | मौलवी का इन्साफ यह था की अब वोह अपने पति की माँ बन गयी है | होना तो यह चाहिए था कि अपराधी ससुर के हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना यां फिर जब्बर्दस्ती इज्ज़त लूटने के LIYE कानून के हवाले कर देना चाहिए था |
इसी तरह पंजाब के एक गाँव में बहुयों को रंडवा ससुर को खुश करना पड़ता था अन्यथा ससुर शादी कर जमीन – जयदाद के और हक़दार पैदा कर देता | ऐसी समस्या का कोई इलाज नहीं है परन्तु SAMAJ और कानून की निगाहों में यह अपराध है | ऐसे रंडवा और भोग – चाहने वाली विधवाओं के लिये अलग स्थान निर्धारित कर देना चाहिए यान वोह बाँझ से शादी करले | समलैगिक सम्बन्ध बनानेवालों के लिये भी अलग स्थान जैसे कोई टाप्पू – जजीरा होना चाहिये तांकी वोह दूसरों को बहला-फुसला कर समाज में अपनी अपनी गन्दगी न फैला सकें |

कोई भी मजहब बहुओं, बेटियों, बेटों, माँ सम्मान औरतों जैसे चाचा – चाची, बुआ – फूफा, मौसा- मौसी, मामा मामी , और गैर औरतों – मर्दों से नाजायज सम्बन्ध रखने कि इज़ाज़त नहीं देता |
वेद तो बुदापे में वानप्रस्थ और संन्यास लेकर जन -कल्याण का आदेश देता है |
यत्र नारे पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता | जहाँ बहुयों, बेटियों, बहनों – भाभियों और मातायों और सास – मातायों और रिश्तों कि दूसरी औरतों को इज्ज़त से देखा जाता है वहां देवता वास करते हैं और जहाँ औरतों को बुरी नज़र से देखा जाता है वहां सब कुछ नष्ट हो जाता है | जहाँ औरत और मर्द कुते – कुतियों कि तरह रहने लग जाते है, वहां परिवार नष्ट हो जाते हैं और बच्चे रुल जाते हैं और वह समाज – और राष्ट्र भी नष्ट हो जाता है |
औरंत ने जन्म दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया |
जब जी चाहा मसला – कुचला —

प्रतिक्रिया

1 )

क्या मुल्लाओं के फरमान समाज के अरमान पुरे करेंगे यां फिर संस्कृतियाँ अपने संस्कारों के साथ अंधेरों में डूब जायेंगी | बिना नारियों, बुद्धिजीवियों और समाज के सभी अंगो की राये लिए बिना फरमान जारी कर देना गुनाह है | क्या ऐसे वस्त्र पहन सुनीता विलियम कभी अन्तरिक्ष में जा सकती है यां फिर क्या यह अंधे – धर्मांद मुल्ले, पंडित और पादरी |
आदमी का चरित्र ही उसका वस्त्र होता है | क्या कोई बता सकता है की बुर्के में ढकी औरत सभ्रांत पाक – महिला है यां कोई वेश्या | निगाहे नेक होनी चाहिये और गैर यां परनारी को मात्री शक्ति अर्थात मां, बहन यां बेटी की तरह देखना चाहिए |

2)

अफगानिस्तान के राज्य परवान गाँव कोई में आंतकियों ने कैसे ऐ के – ४७ चला २२ साल की एक अबला और असहाय औरत नजीबा को गोलियों से छलनी कर मार डाला | यह दरिंदगी नहीं तो क्या है | क्या इस्लाम और दुसरे मजहबों में नजीबा जैसी अबला और असहाय औरतों का यही नसीब है ?
जैसे इस्लाम यशु को भी मसीहा मानता है | भगवान यशु अर्थात मसीहा यशु ने कहा था हाँ जमीन में कमर तक गाड़ी हुई बेबस औरत को पत्थर मरने का अधिकार उसको है जिसने कभी कोई पाप न किया हो | जिस आंतकी ने उस औरत से नाजायज़ सम्बन्ध बनाये औरत की जगह उसके हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना चाहिए था | परन्तु काफ़िर और कायर आंतकी खावंद ने अपनी औरत की इज्ज़त ख़राब करने का बदला नहीं लिया और बेशर्मी से जी रहा है | थू है उसके मूह पर और धिक्कार है उसकी मर्दानगी पर |

करीबन दो साल पहले सहारनपुर साईड की तरफ एक ससुर ने बहु-बिटिया की इज्ज़त लूट ली | मौलवी का इन्साफ यह था की अब वोह अपने पति की माँ बन गयी है | होना तो यह चाहिए था कि अपराधी ससुर के हाथ पीठ पर बांध कर यां कमर तक जमीन में गाड कर पत्थर मार – मार कर अरबी कानून के मुताबिक उसको हलाक कर देना यां फिर जब्बर्दस्ती इज्ज़त लूटने के लिए कानून के हवाले कर देना चाहिए था |
इसी तरह पंजाब के एक गाँव में बहुयों को रंडवा ससुर को खुश करना पड़ता था अन्यथा ससुर शादी कर जमीन – जयदाद के और हक़दार पैदा कर देता | ऐसी समस्या का कोई इलाज नहीं है परन्तु समाज और कानून की निगाहों में यह अपराध है | ऐसे रंडवा और भोग – चाहने वाली विधवाओं के लिये अलग स्थान निर्धारित कर देना चाहिए यान वोह बाँझ से शादी करले | समलैगिक सम्बन्ध बनानेवालों के लिये भी अलग स्थान जैसे कोई टाप्पू – जजीरा होना चाहिये तांकी वोह दूसरों को बहला-फुसला कर समाज में अपनी अपनी गन्दगी न फैला सकें |
कोई भी मजहब बहुओं, बेटियों, बेटों, माँ सम्मान औरतों जैसे चाचा – चाची, बुआ – फूफा, मौसा- मौसी, मामा मामी , और गैर औरतों – मर्दों से नाजायज सम्बन्ध रखने कि इज़ाज़त नहीं देता |

वेद तो बुदापे में वानप्रस्थ और संन्यास लेकर जन -कल्याण का आदेश देता है |
यत्र नारे पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता | जहाँ बहुयों, बेटियों, बहनों – भाभियों और मातायों और सास – मातायों और रिश्तों कि दूसरी औरतों को इज्ज़त से देखा जाता है वहां देवता वास करते हैं और जहाँ औरतों को बुरी नज़र से देखा जाता है वहां सब कुछ नष्ट हो जाता है | जहाँ औरत और मर्द कुते – कुतियों कि तरह रहने लग जाते है, वहां परिवार नष्ट हो जाते हैं और बच्चे रुल जाते हैं और वह समाज – और राष्ट्र भी नष्ट हो जाता है जैसेकि पश्चिमी देशों में संस्कृति नष्ट हो रही है | इस्लाम तो औरत में आधी आत्मा मानता है, चार औरतों को रखने और पञ्च निकाह करने की इज़ाज़त देता है |
औरंत ने जन्म दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया |
जब जी चाहा मसला – कुचला —

3 )

 

“मानसिक रोगी नहीं दुखों का रोगी हूं”

“यह जमाना मुझे मानसिक रोगी कहे मुझे इसमें कोई हर्ज नहीं आखिर दुखों का दौर तो सभी ने जिया है”

दुनिया कितनी अजीब होती है, यदि कोई सुख में ज्यादा हंसने लगे तो उसे पागल कहती है और कोई दुख में ज्यादा दुखी होने लगे तो उसे मानसिक रोगी का नाम देती है. बचपन में आपको याद होगा कि जब किसी चीज को बहुत प्यार किया करते थे और उसे हमेशा अपने पास रखना चाहते थे फिर अचानक उसी चीज के टूटने पर दुखी हो जाते थे और खेलना, नाचना-गाना सब बंद कर दिया करते थे. ऐसा ही शायद वो लोग महसूस करने लगते हैं जो अपनी बहुत कीमती चीज को खो देते हैं.

हैरानी होती है हाल ही में आई खबर को देखकर, जिसने समाज को चौंका दिया कि अपने पिता की लाश के साथ एक हफ्ता, एक बंद कमरे में कोई बिता सकता है. मकान संख्या -1139 अब तक तो लोगों को याद हो गया होगा क्योंकि अशोक नगर के इसी मकान में रजनीश तंवर ने अपने पिता विरेंद्र तंवर की लाश के साथ एक हफ्ता अंधेरे में बिताया और वो भी बिना कुछ खाए हुए. जब ऐसी घटना घटती है तो लोग उस व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर का नाम दे देते है और पुलिस उसे मुजरिम का नाम दे देती है.

क्या रजनीश तंवर जैसे लोग मानसिक रोगी होते हैं? हर दुख को सहने की एक  सीमा होती है. रजनीश तंवर अपने बड़े भाई को एक कार हादसे में खो चुका था और उस हादसे के बाद रजनीश की मां की भी मौत हो चुकी थी. रजनीश के पिता उसका एक मात्र सहारा थे जिन्हें खोने का दुख उसे था पर शायद रजनीश सच को समझना नहीं चाहता था.

सच्चाई से दूरी क्यों बना लेते है
बचपन से ही सिखाया गया है कि सच अच्छे के लिए होता है पर कभी-कभी सच   दुख भी देता है. कहते हैं कि सच जैसा भी हो उसे अपना लेना चाहिए पर जिन्दगी के सफर में बहुत बार ऐसे मोड़ आते हैं जहां सच को अपना पाना मुश्किल हो जाता है. शायद उसी स्थिति में वो कुछ लोग खड़े होते हैं जिन्हें दुनिया मानसिक रोगी का नाम देती है.

क्या समाज से भी दूरी है
मानसिक रोगियों के संदर्भ कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्हें देखकर यह लगा कि शायद अब हमारे समाज में दूरियां आ चुकी हैं. हमारे आसपास क्या हो रहा है अब हम जानना ही नहीं चाहते हैं. सुनंदा और सुचित्रा दोनों बहनें तीन महीने से एक घर में बंद थीं. क्या कभी किसी का भी ध्यान उस बंद घर की तरफ नहीं गया? सच में ऐसी घटनाओं को देखते हुए लगता है कि आज समाज और हमारे बीच में मीलों फासले हैं. 

घटनाएं कुछ कहती हैं……….
हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ में एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया था जब एक बेटी अपने पिता की लाश के साथ एक महीने तक बैठकर रोती रही. उस लड़की का नाम परमजीत था जिसने बचपन में ही अपनी मां को खो दिया था. पर क्या परमजीत आपकी नजरों में मानसिक रोगी है? क्या पुलिस को परमजीत के लिए हिरासत में लेने जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए. निठारी कांड आपको याद होगा और एक रिटायर्ड फौजी का नौ वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म करने जैसी घटना भी आपको याद होगी. लेकिन इन दोनों घटनाओं में व्यक्ति मानसिक रोगी नहीं मुजरिम हैं इसे भी साफ करना जरूरी है.

रिपोर्ट और मनोचिकित्सक क्या कहते हैं
देश में हर एक हजार में 65 लोग मानसिक समस्या की गिरफ्त में हैं और लगभग इस मानसिक रोग से जूझ रहे लोगों की संख्या सात करोड़ से अधिक है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो ‘एनसीआरवी’ की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार मानसिक रूप से जूझ रहे नौ हजार व्यक्तियों में से 465 लोगों ने आत्महत्या की.

मनोचिकित्सकों की राय में जब किसी व्यक्ति की भावनाएं, विचार अथवा व्यवहार दूसरे लोगों के लिए समस्या बन जाए तो यह उस व्यक्ति के मानसिक बीमारी से ग्रस्त होने के लक्षण हो सकते हैं लेकिन समुचित जानकारी के अभाव में लोग इस ओर ध्यान नहीं देते जिससे समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है.  मनोचिकित्सकों के लिए आज भी यह पता लगाना एक चुनौती है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रस्त है तो उसकी बीमारी आखिर क्या है.

आखिरकार सच क्या है
सभी बातों को ध्यान से देखा जाए और समझा जाए तो ‘मानसिक रोगी’ शब्दों को प्रयोग में लाना सही नहीं लगेगा. सच यह है कि जब दुख की सीमा ही नहीं रहती है और जिन्दगी में रिश्ते खोने का एक सिलसिला चल पड़ता है तो शायद सच्चाई को अपना पाना मुश्किल हो जाता है. सही कहा है किसी ने ‘मैं जिन्दगी के सफर में रुका ना होता, अगर मेरे वक्त ने मेरा साथ दिया होता’.