आपसी सहमति थी तो फिर ‘रेप’ क्यों?
“नाबालिग
के साथ संबंध बनाना, भले ही उसकी सहमति ही क्यों ना हो, लेकिन वह भी रेप
ही कहा जाएगा. यह अत्यंत अमानवीय कृत्य है और ऐसा करने वाला सजा पाने योग्य
है. युवक का अपराध किसी भी रूप में क्षमा योग्य नहीं है.”
दिल्ली के
तीस हजारी कोर्ट ने एक बलात्कार के मामले में सजा सुनाते हुए यह कहा है कि
नाबालिग किशोरी से बलात्कार ना सिर्फ उसके तन को घाव देता है बल्कि उसकी
आत्मा तक को कुरेद कर रख देता है. अतिरिक्त सत्र न्यायालय के न्यायाधीश ने
इस मामले को गंभीरता के साथ सुलझाते हुए आरोपी युवक को सात वर्ष सश्रम
कारावास की सजा सुनाई और साथ ही दस हजार रुपए मुचलके का जुर्माना भी लगाया.
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उल्लेखनीय
है कि जब किशोरी को घर में नहीं पाया गया तो उसके पिता ने पुलिस में
शिकायत दर्ज करवाई कि उनके पड़ोस में रहने वाला युवक वसीम उनकी बेटी को
बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है. आस-पड़ोस के लोगों और करीबी दोस्तों की
निशानदेही की सहायता से पुलिस ने दोनों को हरिद्वार से गिरफ्तार किया.
गिरफ्तारी के बाद जब यह प्रेमी जोड़ा दिल्ली लाया गया तो किशोरी का कहना था
कि हरिद्वार में दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए और वो भी आपसी
सहमति से. वसीमा का बयान भी ऐसा ही था लेकिन जब दोनों को न्यायाधीश के
सामने उपस्थित किया गया तो सजा सुनाते हुए उनका कहना था कि संबंध भले ही
आपसी सहमति से ही क्यों ना बने हो लेकिन अगर किशोरी उस दौरान नाबालिग है तो
वह बलात्कार के दायरे में ही आएगा. रेप की शिकार हुई किशोरी, जो शारीरिक
और मानसिक रूप दोनों से ही अपरिपक्व है, ने इस साल बच्चे को जन्म दिया है
जो ना सिर्फ सामाजिक रूप से बल्कि उसके अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिए सही
नहीं है. ऐसे में बहुत हद तक मुमकिन है कि वह मां की भूमिका में ढल नहीं
पाएगी और ना ही अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को समझ पाएगी.
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निश्चित
तौर पर 16 वर्षीय किशोरी की मासूमियत का फायदा उठाकर उसके साथ संबंध
स्थापित करना एक अपराध है जिसके लिए सजा मिलनी भी चाहिए थी लेकिन इस सिक्के
का दूसरा पहलू यह भी है कि आज के दौर में जब बच्चे अपनी उम्र से ज्यादा परिपक्व होते जा रहे हैं तो 16 वर्ष की आयु को किस हद तक अपरिपक्व समझा जाना चाहिए?
इसी तरह
का एक मामला जब फास्ट ट्रैक कोर्ट में दाखिल हुआ जिसमें 20 वर्षीय प्रेमी
और 16 वर्षीय प्रेमिका ने आपसी सहमति के साथ संबंध बनाए थे तो उसमें फैसला
सुनाते हुए न्यायाधीश के वक्तव्य थोड़े भिन्न थे. न्यायाधीश का कहना था कि “आज
जब नाबालिग किशोरियां अपनी उम्र से कहीं अधिक बड़ी युवतियों से ज्यादा
परिपक्व होती जा रही हैं तो अगर ऐसे में वे अपनी मर्जी से अपने पुरुष मित्र
के साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं तो इसमें बलात्कार जैसी बात कहां से आ गई?
ब्वॉयफ्रेंड पर बलात्कार का आरोप लगने के कारण उसका भविष्य खराब हो जाता
है, उसकी शिक्षा में खलल पड़ता है और उसकी सामाजिक छवि भी दूषित होती है
जबकि स्पष्ट तौर पर यह ज्ञात होता है कि लड़की ने अपनी सहमति से ही शारीरिक
संबंध स्थापित किए थे.”
कई बार देखा गया है कि इस उम्र में किशोरियां और किशोर दोनों ही समान रूप से शारीरिक संबंधों के प्रति जिज्ञासा रखने लगते हैं और मौका पड़ने पर इनका अनुसरण करने से भी नहीं हिचकिचाते. यह बात तो सर्वविदित है कि भारतीय समाज में विवाह से पहले बनाए जाने वाले शारीरिक संबंध अनैतिक और निषेध माने जाते हैं लेकिन अगर कोई इनका अनुसरण अपनी मर्जी से करता है तो इसके लिए दोनों पक्षों को समान रूप से दोषी समझा जाना चाहिए. इसे बलात्कार की श्रेणी में डालना शायद उस पीड़ा के साथ अन्याय है जो बलात्कार की शिकार हुई युवती को होती है.
न्यायाधीश
के अनुसार किशोरी लड़की से बलात्कार करना उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ करना
है, बहुत हद तक सही भी है लेकिन यह बात भी समझनी चाहिए कि 16 वर्ष की उम्र
इतनी छोटी भी नहीं होती कि उसे बहलाकर शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी कर
लिया जाए. कहीं ना कहीं इस मुकद्दमे से जुड़ा निर्णय न्यायसंगत नहीं कहा
जा सकता क्योंकि अगर इसे बलात्कार के दायरे में रखा जा रहा है तो इसमें कुछ
हद तक किशोरी भी उतनी ही दोषी थी जितना की आरोपी.
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