Monday, 18 February 2013

अब और नहीं जलेंगी कन्याएं: दहेज के लिए कानून

दहेज शब्द से आज हर वो इंसान परिचित है जो इस समाज का हिस्सा है खास कर जिस घर में लड़की है. आज जिस घर में लड़की पैदा हो जाती है उसके मां-बाप तो उसके जन्म के साथ ही दहेज के बारे में सोचने लगते हैं. यूं तो दहेज माता-पिता द्वारा दिया जाने वाला उपहार होता है लेकिन समाज ने आज इसे बहुत गलत ढंग से लेना शुरू कर दिया है.


दहेज क्या है ?

जो सम्पत्ति, विवाह के समय कन्या के परिवार की तरफ़ से उसे उपहार में दी जाती है उसे दहेज का नाम दिया जाता है किंतु समय के साथ इसके इस रूप में परिवर्तन होता गया और वर को प्रदान किया जाने वाला धन या उपहार दहेज कहा जाने लगा. दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं. यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास रहा है. भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है. संभवत: इस प्रथा को उन समाजों में महत्व प्राप्त हुआ जहां छोटी उम्र में विवाह हो जाते थे .


प्राचीनकाल में दहेज को काफी अच्छा माना जाता था. उस समय के लोगों का मानना था कि हर चीज के पीछे एक उद्देश्य होता है और दहेज लेने के पीछे भी एक अच्छा खासा उद्देश्य था. उनका मानना था कि दहेज का उद्देश्य नवविवाहित पुरुष को गृहस्थी जमाने में मदद करना होता था, जो अन्य आर्थिक संसाधनों के अभाव में शायद वह स्वयं नहीं कर सकता था. कुछ समाजों में दहेज का एक अन्य उद्देश्य भी होता था कि पति की अकस्मात मृत्यु होने पर पत्नी को जीवन निर्वाह में इससे सहायता होगी. दहेज देने के पीछे एक अवधारणा यह भी थी कि पति विवाह के साथ आई ज़िम्मेदारी का निर्वाह ठीक तरह से कर सके.


वर्तमान युग में भी दहेज नवविवाहितों के जीवन-निर्वाह में मदद के उद्देश्य से ही दिया जाता है. लेकिन आज के समाज के लिए ये एक अभिशाप बन गया है. इसका दुष्परिणाम बहुत भंयकर हो रहा है और आज यह नारियों के लिए एक काल बन चुका है.


अब पायल को ही ले लीजिए. कुछ दिनों के बाद उसकी शादी थी. हर लड़की की तरह उसने भी शादी को ले कर बहुत सारे सपने देखे थे. फिर कुछ दिनों के बाद उसकी शादी भी हुई पर उसने जो सोचा था वो बिल्कुल भी नहीं हुआ. शादी के कुछ दिन के बाद से ही उसके ससुराल वालों ने उस पर एक फ्लैट के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया और फिर धीरे-धीरे उसके ससुरालवालों ने उसका सुख चैन सब कुछ छीन लिया.


लेकिन पायल ने हिम्मत नहीं हारी. उसने समय रहते अपनी आवाज उठाई और अपने हक के लिए भी लड़ाई लड़ने का फैसला किया. लेकिन उसे तब बहुत बड़ा झटका पहुंचा जब उसे अपनी इस लड़ाई में अपने पति का साथ नहीं मिला. लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी. उसने भारत के दहेज कानून के अंतर्गत अपने ससुराल वालों पर केस किया. इस केस में उसकी जीत हुई जिसके परिणामस्वरूप उसे अपने ससुराल से अलग रहने और हर महीने मुआवजा भी मिला. लेकिन फिर शायद पायल की जिंदगी पूरी तरह बदल गई और उसके पति को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने अपने परिवार को छोड़ कर अपने पत्नी का साथ देना सही समझा. आज पायल एक खुशहाल जिंदगी जी रही है.

दहेज और भारत


ये तो थी पायल की कहानी लेकिन भारत में बहुत सारी महिलाएं हैं जो पायल की तरह हिम्मत वाली नहीं हैं या फिर जिन्हें अपने हक का ज्ञान नहीं है. भारत जैसे देश में आज जब हम महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का हक दिलाने की बात करते हैं तो वहां सभी को अपने हक के लिए आवाज उठाने का अधिकार है साथ ही इस अधिकार को इस्तेमाल करने से पहले हमें इसके बारे में जानना भी चाहिए.


दहेज के केस


माना कि एक अनुमान के अनुसार सिर्फ साल 2008 में ही दहेज से जुड़े कुल 3876 केस आए थे जिनमें से अधिकतर मामले वधु की मृत्यु के पश्चात थे. इस साल कुल 2500 लड़कियों की जान दहेज की वजह से गई थी. लेकिन अगर पायल की तरह ही अन्य महिलाओं को भी दहेज निषेध कानून की समझ होती तो इस बढ़ते हुए आंकड़े को रोका जा सकता था. आइए जानें भारत में ऐसे कौन-कौन से कानून हैं जो दहेज से जुड़े हैं:


दहेज के लिए कानून


दहेज निषेध के लिए निम्नलिखित धाराओं को लागू किया जाता है.


1) धारा 406 – अगर कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करता है तो उसको और उसके परिवार वालों को इस धारा के अंतर्गत 3 साल की सजा हो सकती है या फिर जुर्माना देना पड़ सकता है या फिर दोनों ही सजा हो सकती है .

2) धारा 304 B – इस धारा के अन्दर उस तरह का केस आता है जिसमें किसी महिला की मौत अगर दहेज के कारण होती है या फिर उसको जलाने की कोशिश की जाती है तो उसके पति और घर वालों को उम्र कैद की सजा होती है. इस धारा के अन्दर कोई जुर्माना नहीं आता है इसमें सीधे सजा होती है.

3) धारा 498 A- इस धारा के अन्दर उस तरह का केस आता है जिसमें  अगर कोई महिला दहेज की प्रताड़ना से तंग आकर जान देने की कोशिश करती है और अगर इसकी शिकायत वो पुलिस से कर देती है तो उसके पति और ससुरालवालों को उम्र भर की सजा हो सकती है.

इसके अलावा भारत में दहेज निरोधक कानून भी है जिसके अनुसार दहेज देना और लेना दोनों ही गैरकानूनी घोषित किया गया है लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया. आज भी बिना किसी हिचक के वर-पक्ष दहेज की मांग करता है और ना मिल पाने पर नववधू को उनके कोप का शिकार होना पड़ता है.

1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया था. इन नियमों के अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए. इस सूची में प्रत्येक उपहार, उसका अनुमानित मूल्य, जिसने भी यह उपहार दिया है उसका नाम और संबंधित व्यक्ति से उसके रिश्ते का एक संक्षिप्त विवरण मौजूद होना चाहिए.


इसके अलावा एक अहम कानून है घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 ( The Protection of Women from Domestic Violence Rules 2005). इस अधिनियम के अनुसार अगर घर में पुरुष के साथ रह रही महिला को पीटा जाता है, धमकी दी जाती है अथवा प्रताड़ित किया जाता है तो वह घरेलू हिंसा की शिकार है. ऐसी प्रताड़ित महिला घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 के अंतर्गत और सहायता प्राप्‍त कर सकती है.

अगर समाज की हर महिला को इन कानूनों और प्रावधानों की समझ हो तो हो सकता है आने वाला भारत महिलाओं के लिए एक बेहतर स्थान बनकर उभरे जहां किसी भी नवविवाहिता को जलाया या मारा नहीं जाएगा.




यौन शिक्षा से ही बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं !!

sex educationदेश में इस समय महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून की मांग उठ रही है. क्या करना चाहिए क्या नहीं ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके इस पर बहस हो रही है. ऐसे में विभिन्न नेताओं और नौकरशाहों द्वारा कुछ ऐसे बयान आते है जिससे समाज एक वर्ग खासा नाराज हो जाता है. महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराध के बीच मुंबई पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह ने कहा है कि स्कूलों में दी जाने वाली सेक्स एजुकेशन से समाज में महिलाओं के प्रति स्थिति और बिगड़ रही है. उन्होंने कहा कि जिन देशों में सिलेबस में सेक्स एजुकेशन शामिल है, वहां महिलाओं के प्रति अपराध ज्यादा हो रहे हैं.


महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक मराठी अखबार की ओर से आयोजित सेमिनार में सत्यपाल सिंह ने कहा कि छात्रों को सेक्‍स एजुकेशन से ज्यादा नैतिक शिक्षा देने की जरूरत है. वह आगे कहते हैं कि सेक्स एजुकेशन को लेकर हमें सोच-समझकर आगे बढ़ने की जरूरत है. सिंह ने अमरीका का उद्धारण दिया. उन्होंने कहा कि अमेरिका के सिलेब्स में सेक्स एजुकेशन शामिल है, पर स्टूडेंट्स को सिर्फ सेक्शुअल रिलेशन बनाना सिखाया जा रहा है. यह सेमिनार महिलाओं की सुरक्षा पर आयोजित की गई थी.


सिंह ने यह भी कहा कि ‘एक सर्वे के मुताबिक रेप की घटनाएं धूम्रपान से ज्यादा होती हैं. जिन देशों ने सेक्स एजुकेशन की शिक्षा दी जा रही है, वहां महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े हैं. स्कूलों में बच्चों को नैतिक शिक्षा दिए जाने पर जोर देते हुए पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सेक्शुअल ऑफेंस शारीरिक से ज्यादा एक मनोवैज्ञानिक क्रिया है. और यह लोगों की प्रदूषित मानसिकता की वजह से हो रहा है. सिंह ने सिनेमा और टेलिविजन सीरियलों को भी आड़े हाथ लिया. उनका मानना है कि टेलिविजन सीरियलों में आजकल शादी से पहले और विवाहेतर सेक्स खुलेआम दिखाए जा रहे हैं. इसके अलावा मोबाइल और इंटरनेट के जरिए भी आज की पीढ़ी सेक्स की ओर ज्यादा रूचि ले रही है.

मुंबई पुलिस कमिश्नर के इस बयान पर कुछ सामजिक कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई है. वैसे बच्चों में सेक्स एजुकेशन दिए जाने को लेकर आज भी समाज कई हिस्सों में विरोध दर्ज कराए जाते है. एक तरफ सेक्स एजुकेशन के समर्थन करने वालों का मानना है कि सेक्स एजुकेशन का उद्देश्य किशोरों में एचआईवी एड्स के प्रति जागरुकता लाना है. वही दूसरी ओर इसके विरोध करने वालों का मानना है कि इस तरह की शिक्षा से बच्चों में सेक्स के प्रति जागरुकता कम और अपराध करने प्रवृति ज्यादा पैदा होगी.


बेबस लड़की के जख्मों को कौन सहलाए……..(Story of Rape Victim

आज पायल के लिए काफी बड़ा दिन था. क्योंकि आज उसका जन्मदिन था और ये जन्मदिन तो कुछ खास ही था. आज पायल 25 साल की हो गई थी. उसने एक दिन पहले ही सोच रखा था कि इस बार वो पहले अपने दोस्तों के साथ दिन में पार्टी करेगी और फिर रात में अपने परिवार के साथ.


RAPE VICTIMउस दिन जब वो सुबह जगी तो सबसे पहले उसकी मां ने उसके सर को चूम कर उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम जीयो हजारो साल, तुम को मेरी भी उम्र लग जाए. इस पर पायल ने कहा कि ऐसे क्यों बोलती हो मां तुम को मेरी उम्र लग जाए.


इस पर उसकी मां ने उसके गाल पर मारा और कहा  कि ऐसे नहीं बोलते हैं. तब तक उसके पापा और बहन भी उसके कमरे में आ चुके थे. दोनों ने उसे जन्मदिन की मुबारकबाद दी और तोहफे भी दिए. उसकी बहन ने उसे तोहफे में फोटोफ्रेम दिया और कहा कि दीदी इसमें अपनी और मेरी तस्वीर लगाना और फिर सब हंसने लगे.

उसके बाद पायल तैयार होकर अपने दोस्तों के साथ पार्टी मनाने चली गई. धीरे-धीरे शाम हो गई….शाम से फिर रात हो गई लेकिन पायल नहीं आई. इधर उसके मां, पापा, बहन सब परेशान हो रहे थे. रात भर इंतजार के बाद जब सुबह तक पायल का कोई पता नहीं चला तो उसके पापा ने सोचा कि पुलिस में खबर कर देनी चाहिए. पुलिस के पास जाने के लिए जैसे ही उसके पापा ने दरवाजा खोला तो सामने पायल खड़ी थी. उसकी हालत काफी खराब थी. उसके पापा उसे पकड़ कर अंदर लाए. उसे देख कर उसकी मां धम्म से नीचे बैठ गई. उन्हें लग गया कि पायल के साथ कुछ बुरा हुआ है.


इधर पायल लगातर रोए जा रही थी और कह रही थी पापा मुझे बचा लो. काफी देर बाद जब उसकी उसकी मां को होश आया वह उसके पास आई और उसे कमरे में ले गई.


पायल कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी और इधर उसकी बहन चुपचाप देख कर ये समझने की कोशिश कर रही थी कि ये सब क्या हो रहा है. और इधर पायल लागतार रोए जा रही थी. दो दिन ऐसे ही बीत गए. घर में ऐसी खामोशी थी मानो किसी ने सालों से कुछ बोला ही ना हो.


फिर ये बात धीरे-धीरे मीडिया में फैल गई और उसके बाद ये बात पूरे शहर में आग की तरह फैल गई कि पायल के साथ रेप हुआ है. बस इसके साथ ही उसके परिवार की बची हुई इज्जत भी लुट गई. हर कोई बाहर निकलने पर सवाल पूछ्ता और ताने मारता. लोग यही कहते कि उनकी बेटी ही बदचलन थी. ये ताने सुन-सुन कर उसके मां-बाप पूरी तरह से टूट चुके थे. पायल ने तो बाहर निकलना बिल्कुल छोड दिया था. वह हर वक्त रोती ही रहती थी.

उसके पापा ने सोचा कि ऐसे नहीं चलेगा. उन्होंने पायल से कहा कि वो उन लडकों का नाम बताए ताकि वह पुलिस में उनकी शिकायत दर्ज करा सकें. फिर उस रात जब सब सोने चले गये तब पायल ने सोचा कि अगर उसके पापा ऐसा करते हैं तो उनकी और बदनामी होगी. फिर पायल ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसके बारे में उसके परिवार वालों ने कभी सोचा भी नहीं था.


अगले दिन जब उसकी मां उसको जगाने गई तब पायल हमेशा के लिए सो चुकी थी. उसकी मां ने उसको जगाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं जगी. पायल इस क्रूर दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी. उसके मां-पिता जोर-जोर से चिल्ला कर रो रहे थे और बहन चुपचाप खड़ी हो कर उस फोटोफ्रेम को देख रही थी जिसे उसने अपनी बहन को तोहफे में दिया था उसके मन में यही चल रहा था कि………“ये आंखें सब को देखती हैं तुझे नहीं तो इसके होने का क्या फायदा. मेरी मुस्कुराहट में जब तू शामिल नहीं होती तो मेरी हंसी मुझे बेमानी और खोखली लगती है……….!!


उपरोक्त दास्तां हर उस पीड़ित लड़की कि हो सकती है जिसे बलात्कार का शिकार बनाया गया हो. अनकही दर्दभरी कहानियों के पीछे कितनी सिसकियां होती हैं इसे जानने की कोशिश ये समाज कभी नहीं करता. व्यवस्था तो पूरी तरह संवेदनहीन है ही और दोस्त, रिश्तेदार भी रेप पीड़िता के लिए उत्पीड़क ही साबित होते हैं. समाज की निर्दयता की शिकार बेबस लड़की के जख्मों को मरहम कैसे लगे यह सोचना हर उस व्यक्ति का कर्तव्य है जो स्त्री को उसे पूरे सम्मान से जीने देने की वकालत करता है. इस ब्लॉग की अगली कड़ियों में हम बलात्कार, इसके दुष्परिणाम, दोषियों की मानसिकता, अपराधी को सजा और पीड़ित को न्याय दिलवाने के उपायों पर चर्चा करेंगे.,




किराए की कोख का पनपता धंधा

            किराए की कोख का पनपता धंधा 


senogeretविज्ञान आज भगवान का रूप ले चुका है. पहले तो इसने सिर्फ मारने के साधन बनाए थे लेकिन अब उसने जन्म देने की कला भी सिखा दी है. विज्ञान ने हमारे जीवन शैली को एक नई ऊंचाई दी है और ये सही भी है क्योंकि प्रगति और विकास के माध्यम से स्थापित होने वाली जीवनशैली ही आधुनिकता कहलाती है. आज जो दंपत्ति संतान के सुख से विहीन हैं उनके लिए सरोगेसी की  सुविधा उपलब्ध है. सरोगेसी यानि वास्तविक मां की जगह एक दूसरी महिला बच्चे को जन्म देने के लिए अपनी कोख का इस्तेमाल करेगी. सरोगेसी को वह महिलाएं अपनाती हैं, जो बच्चे को जन्म देने में असमर्थ होती हैं. आज जहां सब बिकता है हमने मां और ममता को भी बेच दिया कितना आगे निकल गया है मानव? ममता जिस शब्द पर भगवान भी नतमस्तक हो जाते हैं आज बिकने लगी है. आज भारत जैसे गरीब और विकासशील देश में यह प्रकिया एक धंधे की भांति हो गयी है.


आखिर क्यों बिकती और खरीदी जाती है कोख

सरोगेसी की सबसे बड़ी वजह है गरीबी. गरीब  महिलाओं की पैसों की चाहत उन्हें इस काम के लिए राजी करवा देती है. जब पुरुष गरीबी की वजह से अपना खून और किडनी बेचने को तैयार हो जाता है ताकि  उनके घर में चूल्हा जल सके तो ठीक वैसे ही महिलाएं भी गरीबी के कारण अपनी कोख में दूसरे के बच्चे को पाल लेती हैं. बांझपन भी सरोगेसी की एक बड़ी वजह मानी जाती है. विश्व की तो बात ही नहीं है भारत में जितनी भी शादियां होती हैं उसमें से 10 % महिलाएं बांझपन से ग्रस्त होती हैं.

कौन बनती है सेरोगेट मदर

सेरोगेट मदर की खोज के लिए पहले डॉक्टर की सलाह ली जाती है. फिर विभिन्न अखबारों में और आजकल तो इंटरनेट पर भी सरोगेट मां की खोज की जा रही है. उसके बाद महिला की पूरी मेडिकल जांच की जाती है कि कहीं उसे कोई रोग तो नहीं सरोगेट मां की. उम्र अमूमन 18 साल से 35 साल के बीच होती है.

एक कोख की कीमत

सरोगेट मां का सारा खर्च वही लोग उठाते हैं जिन्हें बच्चा चाहिए खराए पर कोकि  भारत में जहां तीन के लिए  लाख तक खर्च होता है वहीं दूसरे देशों में कम से कम 35-40 लाख रुपए तक खर्च आता है. ज्यादा खर्च होने के कारण अब विदेश से भी लोग भारत की तरफ रुख करने लगे हैं और देखते ही देखते यह कारोबार पूरे हिंदुस्तान में फैल चुका है  खासकर दक्षिण भारत में.

सेरोगेसी भारत के कुछ खास स्थानों में सबसे ज्यादा फैला है जैसे उड़ीसा, भोपाल, केरल, तमिलनाडु, मुंबई आदि. एक चीज जो ध्यान देने योग्य है वह है सेरोगेसी ऐसे राज्यों में ज्यादा देखने को मिलती है जहां पर्यटक ज्यादा आते हैं यानि भारत विदेशियों के लिए एक ऐसी जगह बन चुका है जहां सेरोगेट मदर्स आसानी से मिल जाती हैं. और अब तो इसने पर्यटन का रूप ले लिया है. इच्छुक पैरेंट्स को टूर ऑपरेटर पूरा पैकेज ऑफर करते हैं.

भारत में सरोगेसी इसलिए भी आसान है क्योंकि यहां अधिक कानून नहीं हैं और जो हैं उनकी नजर में यह मान्यता प्राप्त है. इसके कुछ नियम निम्न हैं :


1. सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे पर जेनेटिक माता-पिता का हक होगा.

2. बच्चे के जन्म -पिता का ही नाम होना चाहिए मेंप्रमाण पत्र

3. सरोगेसी कांट्रेक्ट में सरोगेट मां के जीवन बीमा का उल्लेख निश्चित रूप से किया जाना चाहिए.

4. यदि सरोगेट बच्चे की डिलीवरी से पहले जेनेटिक माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, उनके बीच तलाक हो जाता है या उनमें से कोई भी बच्चे को लेने से मना कर दे, तो बच्चे के लिए आर्थिक सहयोग की व्यवस्था की जाए.


क्या कोई कानून है जो सेरोगेट मां को भी ध्यान में रखे

क्या कोई कानून है जो सेरोगेट मां को भी ध्यान में रखे 



senogeret.2अब सवाल ये है कि नौ महीने तक पेट में रखने और जन्म देने वाली सरोगेट मदर का बच्चे के प्रति भावनात्मक प्रेम क्या कानूनी कागजों में दस्तखत कराने के बाद खत्म  किया जा सकता है? और क्या जन्म से पहले पता होता है कि बच्चा विकलांग होगा या जुड़वा?


सरोगेट मां तो सिर्फ अपने कोख में दूसरे के भ्रूण को पालती है. यह कुछ ऐसा होता है जैसे आपने सब्जी दूसरे के घर से  ली और पकाया अपने ऑवन में. अब सब्जी कैसी होगी आप कैसे जान सकते हैं. . बच्चा विकलांग है या जुड़वा है तो इसमें दोष तो जेनेटिक मां बाप का हुआ न. सेरोगेट मां का जो पैसों के लालच में आकर अपनी कोख उधार देती है. 


एक गरीब मां अपनी गरीबी में आकर नौ महीने समाज और परिवार के नजरों के तीखे तीर झेल कर एक बच्चे को जन्म देती है और अगर बच्चे में कुछ दोष होने पर लेने वाला मना कर दे तो ऐसे में उस गरीब मां पर क्या बीतेगी आखिर कैसे कोई अपनी ही औलाद को लेने से मना कर . सकता है और एक तो पहले वह उसका देखभाल कर नहीं सकते और अगर छोड़ देते हैं तो यह सरोगेट मां पर जुल्म होगा. आखिर क्या ममता की यही कीमत है. आज के युग में जहां सब बिकता है अब क्या ममता भी बिकेगी यह विषय भी  समाज का सबसे बडा सवाल है क्योंकि हमारा आने वाला कल इससे प्रभावित होने वाला है अगर समय रहते इस विषय पर कानून नहीं बना तो भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है.

बेबी फैक्ट्री या कोख का व्यापार


एक महिला की कोख को बेबी फॉर्म या बेबी फैक्ट्री या कोख का व्यापार जैसे शब्द दिए जा रहे हैं. सवाल ये है कि गरीबी की मजबूरी क्या इस हद तक आ जाती है कि एक महिला अपनी कोख बेचने के लिए मजबूर हो जाती है. यदि एक महिला किसी मजबूरी के कारण कोख को बेचने जैसा कदम उठाती है तो समाज उसे कोख का व्यापार जैसे शब्द दे देता है. सच तो ये है  कि यदि यह मान लिया जाए कि महिला ने अपनी कोख को कुछ पैसे के लिए बेचा है तो खरीदने वाला यह क्यों भूल जाता है कि उसने भी किसी महिला की कोख को खरीदा है. आखिरकार जिम्मेदार दोनों ही हैं फिर सिर्फ महिला के लिए कोख का व्यापार करने जैसे शब्द क्यों?

यह कैसा व्यापारिक रिश्ता है जिसमें जन्म देने वाली मां अपने बच्चे को अपना बच्चा नहीं कह सकती है. ना जन्म लेने वाला बच्चा अपनी जन्म देने वाली मां को मां कह सकता है. समाज पर भी हैरानी होती है कि वह हर चीज की कीमत लगा देता है और अब तो मां की कोख की भी कीमत लगा दी गई है.

यदि सेरोगेसी शब्द से भावनात्मक बातों को निकाल दिया जाए तो यह सच है कि यदि भारतीय महिलाओं को विदेशों में कोख के व्यापार के लिए जाना जाएगा तो वो दिन भी बहुत पास ही होगा जब भारतीय महिलाओं का अपहरण किया जाएगा वो भी कोख को किराये पर लेने के लिए या फिर जबरदस्ती भारतीय महिलाओं की कोख पर अपना हक जमा कर अपना बच्चा पैदा कराने के लिए.

खूबसूरत अहसास के बदले मिली मौत की सजा

  खूबसूरत अहसास के बदले मिली मौत की सजा 



-murder-of-love-कहते है प्यार इस दुनियां का ऐसा खूबसूरत अहसास है जिससे मानव क्या भगवान भी अछूते नहीं रहे हैं. लेकिन शायद यही अहसास दुनियांवालों के नजरों में सबसे बड़ा पाप है. तभी तो अब्दुल हाकिम को प्यार के बदले मिली मौत कि सजा. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के अब्दुल हाकिम, जिन्होंने कुछ साल पहले प्रेम विवाह किया था, को कुछ दिन पहले किसी ने मौत के घाट उतार दिया. हाकिम की पत्नी का कहना है कि उनके पति की हत्या उनके मायके वालों ने की है क्योंकि वह उनके और हाकिम के प्रेम विवाह के खिलाफ थे. यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी से प्यार करना इतना बड़ा पाप है कि उसे मौत की सजा दी जाए? आखिर क्यों लोग प्यार को इतना बुरा मानते है?

 

प्यार तो हर रिश्ते के बीच होता है चाहे वो मां बाप हो या फिर भाई बहन, प्यार की जरूरत सभी को होती है लेकिन अगर कोई लड़का या लड़की किसी से प्रेम करते हैं और अपनी पसंद से उसके साथ शादी भी करना चाहते हैं तो इसमें क्यों किसी को बुराई नजर आती हैं? इस प्यार को पाप का नाम क्यों दिया जाता है? क्यों हमारा समाज इस प्यार को नहीं समझता?

 

वैसे तो 21वीं सदी में जी रहे लोग चांद पर घर बनाने कि सोच रहे हैं लेकिन हमारी सोच आज भी काफी पिछड़ी है और वो भी खासकर प्रेम के मामले में. कहने के लिए तो परिवार वाले अपनी संतान से जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं लेकिन अगर वहीं बच्चा अगर किसी और से प्यार कर ले तो जान भी परिवार वाले ही ले लेते हैं.

आखिर क्यों लोग यह नहीं समझते कि हर किसी का हक है कि वह अपनी मर्जी से जिन्दगी जी सके. जीवन तो एक बार मिलता है फिर उसपर इतनी पाबंदियां क्यों? आज के समय में जिस तरह बलात्कार की घटनाएं अपने चरम पर हैं, उसी प्रकार ऑनर किलिंग यानी झूठी शान की खातिर हत्या के आंकड़ों में भी दिनोंदिन वृद्धि होती जा रही है. पिछले कुछ समय से हरियाणा और उत्तर प्रदेश में बड़ी निर्ममता के साथ प्रेमी जोड़ों को मौत के घाट उतारा जा रहा है या वे खुद परिजनों एवं  समाज के डर से मौत को गले लगा रहे हैं. यह सब हमारी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न तो लगाता ही है  साथ ही यह संदेश भी देता है कि हम आज भी मध्ययुगीन समय में ही जी रहे हैं. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज  प्रत्येक क्षेत्र में जागरुकता आने के बावजूद ग्रामीण समाज, प्रेम के नाम पर काफी पीछड़ा हुआ है.

उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि प्रेम को अक्षम्य अपराध घोषित कर वह जिस तरह लोगों को मार रहा है वह किसी ठोस नींव पर आधारित नहीं है. हरियाणा और उत्तर प्रदेश में  प्रेमियों की हत्याओं के जो मामले प्रकाश में आए हैं उनमें से अधिकांश मामलों में प्रेमियों के परिजनों का किसी न किसी रूप में हाथ रहा है. इन सभी घटनाओं में प्रेमी या प्रेमिका की हत्या करने के उपरांत परिजनों या गांववालों को किसी तरह की आत्मग्लानि का अनुभव भी होता हुआ दिखाई नहीं देता. इससे तो यही साबित होता है कि उनकी मानसीकता कितनी गिरी हुई है.

इस विषय को मात्र प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. जब तक समाज की सोच में कोई बदलाव नहीं आएगा तब तक प्रेमियों के लिए यह समाज इसी तरह के कत्लगाह तैयार करता रहेगा.


 

अरे, बच्चा ही तो है ….(?)

              अरे, बच्चा ही तो है ….(?) 


kidsबच्चों को समाज और देश का भविष्य समझा जाता है. उन्हें जिम्मेदार और परिपक्व बनाने में उनके अपने परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है. बच्चे के मानसिक और चारित्रिक विकास के लिए यह बहुत जरूरी है कि उसे अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए एक स्वस्थ वातावरण मिले और साथ ही परिवार भी हर कदम पर उसकी सहायता करने के लिए तैयार रहे. संतान के जीवन में परिवार की इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए ही बच्चे के लिए परिवार को ही आरंभिक विद्यालय का दर्जा दिया जाता है. 



आमतौर पर यह माना जाता है कि अगर अभिभावक बच्चे का सही और परिपक्व ढंग से पालन-पोषण करें तभी बच्चे के भविष्य को एक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है, अन्यथा उन्हें सही मार्ग पर स्थिर रखना बहुत मुश्किल हो सकता है. इसीलिए आपने देखा होगा कि कई माता-पिता अपने बच्चों के साथ बहुत सख्त व्यवहार करते हैं. इसके पीछे उनका मानना है कि अगर बच्चों के साथ बहुत ज्यादा ढील बरती जाएगी तो वे एक आदर्श व्यक्तित्व ग्रहण नहीं कर पाएंगे.
एक समय पहले तक वैज्ञानिकों का भी कुछ ऐसा ही कहना था. अपने सर्वेक्षणों में वे पहले ही यह बात साबित कर चुके हैं कि अभिभावकों का बच्चों पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है. बच्चों की हर बात मान लेना या उन्हें हमेशा प्यार से समझाना सही नहीं है. कभी कभार बच्चों के साथ कठोरता बरतना भी बहुत जरूरी है.

लेकिन एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि माता-पिता का सख्त व्यवहार बच्चों को कुंठित और तनावग्रस्त बना देता है. विशेषकर वे माताएं जो अपने बच्चों के साथ सख्त व्यवहार करती हैं और उन्हें हर बात पर टोकती हैं, उनके बच्चों में आत्मविश्वास कम होने लगता है और वे मानसिक रूप से भी परेशान होने लगते हैं.

एक ओर जहां चीनी लेखक एमी चुआ ने अपनी किताब में यह लिखा है कि एशियाई देशों में अभिभावको द्वारा बच्चे के साथ किया जाने वाला सख्त व्यवहार उन्हें काबिल और अच्छा प्रतियोगी बनाता है, माता-पिता जब बच्चे के ऊपर दबाव डालते हैं तो बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी अच्छा प्रदर्शन करते हैं. वहीं दूसरी तरफ मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डेसिरी क्वीन का कहना है कि वे बच्चे जो माता-पिता के दबाव में आकर उपलब्धियां पा लेते हैं, वे भले ही सफल हो जाएं लेकिन मानसिक तौर पर वे परेशान और कुंठित हो जाते हैं. अन्य छात्रों की तुलना में वे ज्यादा तनाव में रहते हैं.

डेसिरी क्वीन ने चीन और अमेरिका के प्रतिष्ठित स्कूलों के बच्चों को अपने इस शोध का केन्द्र बनाया जिसके बाद उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि बच्चों पर अधिक सख्ती करना उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाता है.

डेली न्यूज में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार क्वीन का कहना है कि एमी ने भले ही यह लिखा हो कि पश्चिम में बच्चे चीनी या एशियाई बच्चों से ज्यादा खुश हैं लेकिन वे बच्चे वास्तविक रूप से खुश नहीं रहते.

अगर इस शोध और उसकी स्थापनाओं को भारतीय परिवेश के अनुसार देखें तो अभिभावकों का बच्चों के साथ सख्ती या कठोरता करना उन्हें सही मार्ग पर अग्रसर रखने के लिए काफी हद तक सहायक होता है. लेकिन यह कितना और किस हद तक होना चाहिए इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.

कई बार देखा जाता है कि अगर अभिभावक बच्चों को हर बात पर डांटते या उन पर दबाव बनाते हैं तो उनके बच्चे परेशान रहने लगते हैं और वे अवसाद ग्रसित हो जाते हैं. वहीं अगर माता-पिता सख्ती ना बरतें तो बच्चों को सही मार्ग पर चलाना दूभर हो जाता है. अभिभावकों की अनदेखी बच्चों के चारित्रिक विकास को बाधित करती हैं. वे अपनी पढ़ाई को तो नजर अंदाज करने ही लगते हैं इसके अलावा नैतिक और सामाजिक मूल्यों से दूर हो जाते हैं.

प्राय: देखा जाता है कि जिन बच्चों की गलतियां परिवार और समाज हमेशा माफ करता हैं, वे कभी भी सही और गलत में अंतर नहीं कर पाते. वह बहुत ज्यादा जिद्दी हो जाते हैं. उन्हें अपने हितों और इच्छाओं के आगे कुछ भी नजर नहीं आता. सहनुभूति या सहयोग जैसे शब्द उनके लिए कुछ खास महत्व नहीं रखते. समाज और परिवार की जरूरत और आपसी भावनाओं से उनका कोई सरोकार नहीं रहता. वह जानते हैं कि उनकी हर भूल माफ कर दी जाएगी इसीलिए उन्हें अपनी बड़ी से बड़ी गलती भी बहुत छोटी लगती है. वह कभी भी जिम्मेदार और परिपक्व व्यक्ति नहीं बन पाते.

इसीलिए जरूरी है कि कठोरता और प्रेम में सामंजस्य बैठा कर ही बच्चों के साथ व्यवहार किया जाए. दोनों की ही अति संतान और परिवार के भविष्य पर प्रश्नचिंह लगा सकती है.